वन और पर्यावरण
झारखंड की नदियां और जल का संरक्षण...
ABN Bureau
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25 Nov, 2021
•
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एबीएन डेस्क (शिवशंकर उरांव)। हिमालय तीन प्रमुख भारतीय नदियों का स्रोत है- सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र। भारतीय संस्कृति की साक्षी गंगा अपने मूल्यवान पारिस्थितिकी, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्त्व के साथ भारत की सबसे पवित्र नदियों में से एक है। लगभग ढाई हजार किलोमीटर की यात्रा करने वाली यह भारत की सबसे लंबी नदी है। गंगा नदी घाटी क्षेत्र देश की छब्बीस फीसद भूमि का हिस्सा है और भारत की तियालीस फीसद आबादी इससे पोषित होती है। भारत के कुल अनुमानित भूजल संसाधनों का लगभग चालीस फीसद गंगा बेसिन से आता है। शहरी, आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्रों से मीठे पानी की लगातार बढ़ती मांग और संरचनात्मक नियंत्रण के कारण गंगा का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो गया है। पारंपरिक नदी प्रबंधन में संरचनात्मक नियंत्रण का प्रभुत्व था, जिसके परिणामस्वरूप नदी कार्यों का स्तर कम होता गया। गंगा पुनर्जीवन और संरक्षण के चार संरचनात्मक स्तंभ हैं- अविरल धारा (निरंतर प्रवाह), निर्मल धारा (स्वच्छ जल), भूगर्भिक इकाई (भूवैज्ञानिक विशेषताओं का संरक्षण) और पारिस्थितिक इकाई (जलीय जैव विविधता का संरक्षण)। हमें यह जानना चाहिए कि चार पुनर्स्थापना स्तंभों को एकीकृत किए बिना हम गंगा की सफाई के सपने को साकार नहीं कर सकते। भारत में पानी राज्य का विषय है और जल प्रबंधन वास्तव में ज्ञान आधारित सोच और समझ पर नहीं टिका है। गंगा के प्रबंधन में ह्यबेसिन-व्यापक एकीकरणह्ण का अभाव है, साथ ही विभिन्न तटवर्ती राज्यों के बीच भी तालमेल की भारी कमी है। इसके अलावा, जल जीवन मिशन के तहत 2024 तक सभी निर्दिष्ट स्मार्ट शहरों में जलापूर्ति और अपशिष्ट जल उपचार के बुनियादी ढांचे को उन्नत करने और स्वच्छ जलापूर्ति सुनिश्चित करने की एक बड़ी चुनौती है। सीमित जल संसाधनों को देखते हुए यह कार्य बहुत बड़ा है। लगभग तीन दशकों तक गंगा को साफ करने के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपनाई गईं। इनमें गंगा एक्शन प्लान (जीएपी, चरण एक और दो ) और राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की स्थापना जैसे प्रयास थे, लेकिन लंबे समय तक इनके ठोस नतीजे नहीं मिले। दिसंबर 2019 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में अपनी पहली बैठक में गंगा परिषद ने पांच राज्यों में गंगा बेसिन के दोनों ओर पांच किलोमीटर क्षेत्र में जैविक समूहों को बढ़ावा देकर गंगा के मैदानों में स्थायी कृषि को बढ़ावा देने की योजना पर काम किया। सरकार को अंतत: बेसिन में अधिक क्षेत्र को शामिल करने के लिए इसे फैलाने की योजना बनानी चाहिए। नदी किनारे की कृषि संपूर्ण जैविक होनी चाहिए। शहरीकरण के विस्तार और जनसंख्या के कारण नदियाँ प्रदूषित हुई हैं। इसका असर यहाँ की स्वर्णरेखा नदी पर भी पड़ा है। यह छोटानागपुर के पठारी भूभाग नगड़ी से निकलती है। राँची जिÞले से प्रवाहित होती हुई स्वर्ण रेखा नदी सिंहभूम जिÞले में प्रवेश करती है तथा उड़ीसा राज्य में चली जाती है। स्वर्ण रेखा के सुनहरी रेत में सोने की मात्रा पाई जाती है। किन्तु इसकी मात्रा अधिक न होने के कारण व्यवसायी उपयोग नहीं किया जाता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद की रिर्पोट से स्वर्णरखा के प्रदूषण के स्तर का खुलासा हुआ है। आलम यह है कि ड्रेनेज तथा सिवेज का निकास इस नदी में हो रहा है। इसके प्रदूषण के सन्दर्भ में झारखण्ड उच्च न्यायालय को स्वत: संज्ञान लेना पड़ा। उच्च न्यायालय ने राज्य को सरकार को निर्देश दिया है। इसके लिये राज्य सरकार ने 1319 करोड़ रुपये की लागत से योजना का प्रारूप तैयार किया है। राज्य में गंगा साहेबगंज जिले से प्रभाहित होती है। बिहार के तर्ज पर पीने का जल हम वहां से उन जिलों को उपलब्ध करा सकते हैं जहां कठिनाई है। राज्य सरकार ने पहले भी इस योजना को स्वीकृत करने के लिये मंत्रालय से अनुरोध किया था, लेकिन मंत्रालय की ओर से कार्रवाई की सूचना अप्राप्त है। केन्द्र सरकार से अनुरोध किया है कि वह सम्पूर्ण सीवेज सिस्टम को विकसित कर बहुप्रतिक्षित माँग को पूरा करें। उन्होंने योजना की राशि केन्द्र के स्तर से या अन्तरराष्ट्रीय वित्त पोषण के माध्यम से उपलब्ध कराने का भी सुझाव दिया है। झारखण्ड की दूसरी महत्त्वपूर्ण नदी है दामोदर। दामोदर नदी का पानी पीने लायक नहीं रह गया है। पीने की बात तो दूर पानी इतना काला और प्रदूषित है कि लोग नहाने से भी कतराते हैं। इस प्रदूषण के जिम्मेदार हैं यहां के कल-कारखाने और खदान। हजारीबाग, बोकारो एवं धनबाद जिलों में इस नदी के दोनों किनारों पर बड़े कोलवाशरी हैं, जो प्रत्येक दिन हजारों घनलीटर कोयले का धोवन नदी में प्रवाहित करते हैं। इन कोलवाशरियों में गिद्दी, टंडवा, स्वांग, कथारा, दुगदा, बरोरा, मुनिडीह, लोदना, जामाडोबा, पाथरडीह, सुदामडीह एवं चासनाला शामिल हैं। इन जिलों में कोयला पकाने वाले बड़े-बड़े कोलभट्ठी हैं जो नदी को निरन्तर प्रदूषित करते रहते हैं। चन्द्रपुरा ताप बिजलीघर में प्रतिदिन 12 हजार मिट्रिक टन कोयले की खपत होती है और उससे प्रतिदिन निकलने वाले राख को दामोदर में प्रवाहित किया जाता है। इसके अतिरिक्त बोकारो स्टील प्लांट का कचरा भी इसी नदी में गिरता है।नजीजतन दामोदर नदी के जलनमूने में ठोस पदार्थों का मान औसत से अधिक है। नदी निरन्तर छिछली होती जा रही है और इसके तल एवं किनारे का हिस्सा काला पड़ता जा रहा है।दामोदर नदी के जल में भारी धातु- लौह, मैगजीन, तांबा, लेड, निकेल आदि पाये जाते हैं। प्रदूषण का आलम यह है कि नदी के जल में घुलित आॅक्सीजन की मात्रा औसत से काफी कम है। इसके सवाल पर निरन्तर आन्दोलन होता आया है। 3 फरवरी 2015 को हुई बैठक में यह किया गया था कि दामोदर नदी जो गंगा की सहायक नदी है, उसे नमामि गंगे परियोजना में शामिल किया जाएगा। नदियों में मिलने वाले सभी प्राकृतिक नाले आज सीवेज चैनल में बदल गए हैं। ऐसे नालों को फिर से स्वस्थ जल निकायों में बदलना होगा।झारखंड की नदियों का संरक्षण और उनका सदउपयोग के साथ गंगा के जल से राज्य को होने वाले लाभ का अधिकाधिक उपयोग भी आवश्यक है। आखिर जल ही जीवन है और हरियाली भी। (लेखक भाजपा एसटी मोर्चा झारखंड के अध्यक्ष हैं)।
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