एबीएन सोशल डेस्क। एक समय की बात है। माता पार्वती जी अपनी सहेली जया और विजया के साथ सुन्दर मंदाकिनी नदी के किनारे पर स्नान करने के लिए गई। तीनों स्नान करके बाहर आकर बालू-मिट्टी के शिवलिंग का निर्माण कर पूजन किया। फिर विसर्जन किया। उसके बाद माता और जया-विजया टहलने लगे। टहलते-टहलते जया-विजया को बहुत ही जोर की भूख लगी। उन दोनों ने माता पार्वती से भोजन मांगा। परन्तु माता ने उन्हें प्रतीक्षा करने को कहा। इस प्रकार जया विजया बार-बार भोजन मांगती और माता बार-बार प्रतीक्षा करने हेतु कहती। जब भूख असहनीय हो गई, तब जया-विजया ने करूणा भरे वचन से बोली। माता बच्चे को भूख लगने पर अपने बच्चों को तुरंत भोजन देती है। लेकिन आप तो हमें बार-बार प्रतीक्षा हेतु कहती है। आप तो अन्नपूर्णा है, फिर भी आप ऐसा क्यों कहती है? माता जया विजया के ऐसा करूण भरे वचन सुनकर माता पार्वती की आंख में आंसू आ गये और उसने तुरंत अपना सिर से धड़ को अलग कर दिया। उनका सिर कट कर उनके बाएं हाथ में आ गिरा और धड़ से 3 धाराएं निकली, जिससे दो धाराएं माता ने सखियों की ओर प्रवाहित किया और तीसरी धारा माता स्वयं पीने लगी। इस प्रकार दोनों सखियां प्रसन्न हो गई। तभी से माता का नाम छिन्नमस्तिका पड़ गया। मां पार्वती के जैसा कोई दयालु देवता या देवी नहीं है, जो अपने बच्चों के लिए अपने मस्तक तक को काट लेती है और मां ही एक ऐसी होती है जो अपने बच्चों को नि:स्वार्थ भाव से प्रेम करती है। मां की ममता हमेशा हम बच्चों पर बनी रहे। जो अपने दोनों हाथों में तलवार और अपनी कटी हुई मस्तक धारण करती है। अपने भक्तों के लिए सदा वरदायनी रहती है, जो ममता और करूणा की देवी है। जिसने कामदेव और रति को अपने पैरों तले दबाये हुए है। जिसके अगल बगल जया-विजया है। वो छिन्नमस्तिका दुर्गा देवी हमें मंगल प्रदान करें और सबका कल्याण करें।