समाज
जड़-चेतन का मूल भगवान शिव ही हैं : पंडित रामदेव पांडेय
ABN Bureau
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21 Jul, 2022
•
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टीम एबीएन, रांची। विश्व का मूल तत्व सिर्फ एक और शक्ति रूप है, जिसे धर्म में ईश्वर, गौड, अल्लाह कहते हैं। विज्ञान ने इसे ऊर्जा कहा है। व्यापक विश्व रूप भगवाना... इसी मूल तत्व या परम शक्ति को जानने की कोशिश शुरू से ही धर्म और विज्ञान करते रहे हैं। मनीषी जन चिन्तन और वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा प्रकृति को पहचान कर अन्त में आत्म तत्व को पहचानेंगे। विज्ञान कहता है कि खरबों साल में प्रलय आएगा, पर वैदिक ग्रन्थों में प्रलय का रूप तीन तरह निर्धारित किया है। प्रलय में ब्रह्मा की आयु समाप्त होती है। धरती जलमग्न हो जाती है। रजोगुण से बने प्राणियों का जीवाश्म हो जाता है और विष्णु यानि आत्मिक सत्व गुण का एक दिन पूरा होता है। फिर अतिप्रिय होता है। अर्थात ब्रह्मा की पूरी आयु विष्णु का एक दिन होता है। इस तरह विष्णु सौ साल जीते हैं। इसके बाद अतिप्रलय होता है। इसमें बारहों सूर्य पृथ्वी के करीब आते हैं, तो पृथ्वी और सौरमंडल भी पिघल कर तरल अवस्था में आ जाता है। सिर्फ गैस रहता है। ब्रह्माण्ड में धूम-कुहासा हो जाता है। विष्णु की आयु पूरी होने पर रूद्र, शिव नहीं शिव का अंश है। रूद्र का एक दिन होता है। यह भी सौ साल जीते हैं। इस समय तम् यानि शंकर की प्रलयकारी शक्ति के सामने कुछ नहीं रहता है। इसे ही महाकाल, महाशक्ति, परम शक्ति कहा गया है। इस अवस्था में परमाणु के अंशानु, प्रोटोन इलेक्ट्रान और न्यूट्रॉन में पुट जाते हैं। यही सत, रज और तम हैं। विष्णु, ब्रह्म और शिव की शक्ति महालक्ष्मी, सरस्वती और महाकाली है। यही कुहासा को अध्यात्म, काली, धूमावती कहा है, जो महाविद्या है, प्रलय काल के अक्षुण्ण जड़ात्मक शक्ति से ब्रह्माण्ड का निर्माण होता है। इस शुभ शक्ति को आदि शक्ति, जगत जननी, शिव और शंकर कहा गया है, जो अविनाशी है। यही सत्, चित् और आनन्द है। यही अर्धनारीश्वर रूप दिखाया गया है। ब्रह्मा को, शिवलिंग मैथुनी सृष्टि के मूल या बीज का प्रतीक है। अष्टमातृका और अष्टमूर्ति शिव से अष्टवसुधा से ब्रह्माण्ड की रचना हुई है। इसलिए शिव ही जड़ चेतन का मूल है। इस तरह सृष्टि रचना पर पंडित रामदेव पाण्डेय ने शिवमहापुराण के छठे दिन की कथा में शिव के स्वरूप को गिनाया। बताते चलें कि यह कथा 23 जुलाई की शाम तक चलेगी।
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