टीम एबीएन, रांची। विश्व का मूल शून्य रूप आकाश ही शिव है। सृष्टि के किसी वस्तु का निर्माण या विनाश नहीं होता सिर्फ रूप परिवर्तन होता है। वैसे ही शिव के अनेक रूप समष्टि और व्यष्टि में हैं। प्राकृतिक प्रलय से पंच तत्व का रूप बदल जाता है। शून्य में सभी समाहित है, यह शिव है। निराकार ओमकार मूलम तुरीयम, शिव का सघोजात, भीम, अघोर, निशान वामदेव, आकाश, जल, वायु, अग्नि और आकाश रूप में अवतार है, जिनके संयोग से जीव की सृष्टि हुई। उक्त बातें पंडित रामदेव पाण्डेय ने कही। वह राम जानकी मंदिर हाउसिंग कॉलोनी बरियातू में आयोजित श्री शिवमहापुराण की कथा के पांचवें दिन श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा कि यही त्रिगुणात्मक है। सत, रज और तम इसे ही फ्राइड ने मन के तीन गत्यात्मक पहलु कहा है जो अबोधात्मा, ज्ञानात्मा और आदर्शात्मा कहा है। शिव में यह समत्व रूप में है तो रामायण में रजो गुण सीता, तमोगुण रावण और सतोगुण राम के रूप में है। राम लखन बीच सीय सोभ कैसे, ब्रह्म जीव बीच माया जैसे... जीवन में सदैव सीता स्वरूप पवित्रतात्मा या अवधात्मा हुआ करती है जो हमेशा राम यानि आदर्श आत्मा के साथ रहना चाहती है। जिस व्यक्ति में रामत्व सुपर इगो प्रबलता होती है, उसके दुर्गुणों या रावणत्व/इगो मारा जाता है, इसलिए मनुष्य को अपनी आत्मा को कष्ट से मुक्त रखने के लिए रामत्म/ आदर्श आत्मा /सुपर इगो/ सतोगुण को सबल बनाना चाहिए। इसलिए शिव जी राम-राम जपते हैं और हजारों करोड़ सुपर इगो की कथाएं कहकर भी राम को ईश्वर मानते हैं।