टीम एबीएन, रांची। आदिवासियों के प्रकृति प्रेम के प्रतीक के रुप में सरहुल पर्व पूरे झारखंड में मनाया जाता है। पिछले 2 सालों से कोरोना के कारण शोभा यात्री नहीं निकाली जा सकी थी, लेकिन इस बार 4 अप्रैल को भव्य जुलूस निकाला जाएगा।
प्रकृति को समर्पित है सरहुल पर्व : इस त्योहार के दौरान प्रकृति की पूजा की जाती है। आदिवासियों का मानना है कि इस त्योहार को मनाए जाने के बाद ही नई फसल का उपयोग शुरू किया जा सकता है। चूंकि यह पर्व रबी की फसल कटने के साथ ही शुरू हो जाता है, इसलिए इसे नए वर्ष के आगमन के रूप में भी मनाया जाता है।
सर" और "हुल" से मिलकर बना है सरहुल : सर का मतलब सरई या सखुआ फूल होता है। वहीं, हुल का मतलब क्रांति होता है। इस तरह सखुआ फूलों की क्रांति को सरहुल कहा गया है। सरहुल में साल और सखुआ वृक्ष की विशेष तौर पर पूजा की जाती है।
महिलाएं लाल पैड की साड़ी पहनती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सफेद शुद्धता और शालीनता का प्रतीक है, वहीं लाल रंग संघर्ष का प्रतीक है। सफेद सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा और लाल बुरु बोंगा का प्रतीक है। इसलिए सरना का झंडा भी लाल और सफेद होता है।