एबीएन डेस्क। हम सब जानते हैं कि होली रंगों का त्योहार है। रंग के बिना होली फीकी हो जाएगी। इसके लिए तो आपको रंग खरीदना ही पड़ेगा। लेकिन रंग भी अज़ीब है, अगर खरीदो तो नकली मिलता है और चुराओ तो असली।
अब यह भी क्या बात हुई, भला रंग भी चुराया जा सकता है?
हां, वह गीत सुना है न आपने, रंग भरे मौसम से रंग चुरा के....
तो अगर दुकान से रंग लेना हो तो खरीदना होगा, मगर प्रकृति से लेना हो तो चुराना होगा।
पुड़ियों में खरीदे गए रंग होली के दूसरे दिन तक भी ठीक से बने नहीं रहते मगर प्रकृति से चुराए रंग आजीवन रहते हैं।
जानते हैं क्यों?
क्योंकि पुड़ियों के रंग तन रंगते हैं और प्रकृति के रंग मन।
हम सबने हमेशा होली को मस्ती और बेफ़िक्री के अवसर के तौर पर लिया और कुछ गलत भी नहीं है। मस्ती और बेफ़िक्री जीवन में जरूरी है।
लेकिन मस्ती और बेफ़िक्री को लापरवाही तक पहुंचने नहीं देना चाहिए।
और हमने यही किया है।
इसलिए आज होली के मायने कहीं खो गए हैं।
आइये न, इस होली कुछ नया करते हैं।
उगते और डूबते सूरज से रंग चुराकर हम सब एक दूसरे के मन को रंगें।
हमने मस्ती और बेफ़िक्री में सूरज के इस रंग को भुला दिया है। हमारी इसी भूल का परिणाम है कि HOLI का H और I कहीं खो गया है। हमें उसे वापस अपने जीवन में लाना है।
आप समझ रहे हैं न?
तो आइये सूरज से उसका यह रंग चुराकर सबको रंगें। खासकर बच्चों के मन को जरूर रंग दें क्योंकि इस रंग की सबसे ज्यादा जरूरत उन्हीं को है।
अगर आज सुबह चूक गए हैं तो शाम को सूरज से ले लीजिए। अगर शाम को भी याद न रहे तो कल सुबह अवसर मिलेगा। आप रोज भूलेंगे तो भी सूरज आपको रोज मौका देगा क्योंकि सूरज हमारे लिए "भगवा होली" रोज मनाता है। होली की शुभकामनाएं...(मनोहर रुद्र पांडेय के फेसबुक वाल से साभार)