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चालीस दिनों तक व्रज में चलने वाला होली महोत्सव शुरू

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चालीस दिनों तक व्रज में चलने वाला होली महोत्सव शुरू
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एबीएन डेस्क (जीवीएस शास्त्री)। चालीस दिनों तक चलने वाला ब्रज होली महोत्सव शुरू हो चुका है। इसी के साथ होली के कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए देश और दुनिया से श्रद्धालु मथुरा पहुंचने लगे हैं। ब्रज में बसंत पंचमी पर होली का ढांडा गढ़ने के साथ ही ब्रज के लगभग सभी मंदिरों में होली महोत्सव की शुरूआत हो जाती है। यहां हम आपको पूरे कार्यक्रम के बारे में बता रहे हैं। समाज गायन की परंपरा : देश-विदेश में विख्यात ब्रज की होली में समाज गायन विशेष स्थान रखता है, जिसमें होली गीत और पद गायन की अनूठी परंपरा है। इसमें पारंपरिक अंदाज में ठाकुरजी के समक्ष ब्रजवासी-सेवायत ब्रजभाषा में होली पदों का गायन करते हैं। समाज गायन की शुरूआत भी ब्रज के मंदिरों विशेषरूप से बरसाना स्थित श्रीजी मंदिर में बसंत पंचमी से हो जाती है। गुरुवार को श्रीजी मंदिर में पड़ गायन के बाद सेवायत गोस्वामीजनों ने एक-दूसरे को गुलाल लगाया। गोकुल स्थित गुरु शरणानंदजी महाराज के महावन रमणरेती आश्रम में हर साल पारंपरिक होली का आयोजन किया जाता है। इसमें टेसूके फूलों और गुलाल से होली खेली जाती है। बरसाना में लड्डू होली : मथुरा के बरसाना में लड्डू होली धूमधाम से मनाई जाती है। यह बरसाना की विश्व विख्यात लठ्ठमार होली से एक दिन पहले लाडली मंदिर में मनाई जाती है। इस बार लड्डू होली का आयोजन 03 मार्च 2020 को किया गया। बरसाना में लट्ठमार होली के अगले दिन नंदगांव में लट्ठमार होली खेली जाती है। इस बार यह आयोजन 05 मार्च को हुआ। श्रीकृष्ण जन्मस्थान में लट्ठमार होली : बरसाना और नंदगांव में लट्ठमार होली के बाद रंगभरनी एकादशी के दिन श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर होली मनाई जाती है। इस दिन ब्रज में देश-विदेशी भक्तों के साथ पूरा मथुरा यहां जुटता है। इस बार यह आयोजन 6 मार्च को हुआ। गोकुल में छड़ीमार होली : भगवान कृष्ण के गांव गोकुल में छड़ीमार होली खेली जाती है। गोकुल में श्रीकृष्ण बाल रूप में रहे थे इसलिए यहां लाठी के बजाए छड़ी होली जाती है, ताकि उन्हें ज्यादा चोट न लगे। इस बार 7 मार्च 2020 को गोकुल में इसका आयोजन किया जाएगा। दाऊजी का हुरंगा : दाऊजी का हुरंगा मथुरा के दाऊजी मंदिर में आयोजित होता है। यह मंदिर प्रसिद्ध बलदेव गांव में स्थित है। इसका आयोजन ब्रज के राजा बलदेव (दाऊजी) के आंगन में किया जाता है। इस बार इसका आयोजन 11 मार्च 2020 को किया जाएगा। लोक मान्यतानुसार बरसाना की लठमार होली भगवान कृष्ण के काल में उनके द्वारा की जाने वाली लीलाओं की पुनरावृत्ति जैसी है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ इसी प्रकार कमर में फेंटा लगाए राधारानी तथा उनकी सखियों से होली खेलने पहुंच जाते थे तथा उनके साथ हंसी- ठिठोली करते थे जिस पर राधारानी तथा उनकी सखियां ग्वाल वालों पर डंडे बरसाया करती थीं। ऐसे में लाठी-डंडों की मार से बचने के लिए ग्वाल वृंद भी लाठी या ढ़ालों का प्रयोग किया करते थे जो धीरे-धीरे होली की परंपरा बन गया। यही कारण है कि आज भी इस परंपरा का निर्वहन उसी रूप में किया जाता है। नाचते - झूमते गाते गांव में पहुंचने वाले लोगों को औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से उन्हें पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष खुद को बचाते भागते हैं। सब मारना पीटना हंसी -खुशी के वातावरण में होता है। औरतें अपने गांवों के पुरूषों पर लाठियां नहीं बरसातीं, लेकिन शेष आस- पास खड़े लोग बीच -बीच में रंग बरसाते हुए दिखाई देते हैं। बरसाने में टेसू के फूलों के भगोने तैयार रहते हैं। दोपहर तक घमासान लठमार होली का समां बंध चुका होता है। नंदगांव के लोगों के हाथ में पिचकारियां और बरसाने की महिलाओं के हाथ में लाठियां होती हैं और फिर शुरू हो जाती है होली।
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