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गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को

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गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को
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श्रीकृष्ण की भक्ति,गौसेवा और प्रकृति संरक्षण का अनुपम पर्व : संजय सर्राफ 

टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि गोवर्धन पूजा हिंदू धर्म का अत्यंत पवित्र, धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्व है। इसे अन्नकूट, गिरिराज पूजा तथा गोवर्धन महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व प्रतिवर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष गोवर्धन पूजा 10 नवंबर दिन मंगलवार को श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनायी जायेगी। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गौमाता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में ब्रजवासी वर्षा और अच्छी फसल की कामना से देवराज इंद्र की पूजा किया करते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि मनुष्य के जीवन का वास्तविक आधार प्रकृति, पर्वत, वन, जल, भूमि और गौवंश हैं। इसलिए इनकी पूजा एवं संरक्षण करना चाहिए। श्रीकृष्ण की प्रेरणा से ब्रजवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इससे क्रोधित होकर इंद्रदेव ने ब्रज में मूसलाधार वर्षा और भयंकर तूफान उत्पन्न कर दिया। 

ब्रजवासियों को इस संकट से बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा अंगुली पर विशाल गोवर्धन पर्वत उठा लिया। सात दिनों तक समस्त ब्रजवासी, गोप-गोपियां और गौवंश पर्वत के नीचे सुरक्षित रहे। अंतत: इंद्र का अहंकार समाप्त हुआ और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की महिमा स्वीकार की। तभी से गोवर्धन पूजा की परंपरा प्रारंभ होता है इस दिन प्रात:काल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किये जाते हैं। 

घरों, आंगनों और मंदिरों में गोबर से गोवर्धन पर्वत की प्रतीकात्मक आकृति बनायी जाती है। उसे फूलों, पत्तियों और रंगों से सजाकर रोली, अक्षत, दीप, धूप, नैवेद्य एवं मिठाइयों से पूजा की जाती है। भगवान श्रीकृष्ण की आरती उतारी जाती है तथा परिवार की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की जाती है। श्रद्धालु गोवर्धन की परिक्रमा भी करते हैं। 

गोवर्धन पूजा के अवसर पर मंदिरों में अन्नकूट महोत्सव का आयोजन होता है। भगवान श्रीकृष्ण को विभिन्न प्रकार के पकवान, मिठाइयां, फल, सब्जियां और छप्पन भोग अर्पित किये जाते हैं। अन्नकूट का अर्थ है अनेक प्रकार के अन्न एवं व्यंजनों का पर्वत। पूजा के उपरांत श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरित किया जाता है। अनेक स्थानों पर भजन-कीर्तन, धार्मिक आयोजन और सामूहिक भंडारे भी होते हैं। 

इस पर्व पर गौमाता की पूजा का विशेष विधान है। गायों को स्नान कराकर तिलक लगाया जाता है तथा गुड़, रोटी, चारा और अन्य खाद्य सामग्री खिलायी जाती है। गौवंश को भारतीय संस्कृति में समृद्धि, सेवा और पोषण का प्रतीक माना गया है। गोवर्धन पूजा कृषि, पशुपालन और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को भी रेखांकित करती है। 

गोवर्धन पूजा हमें अहंकार त्यागने, प्रकृति का सम्मान करने, अन्न का आदर करने, गौसेवा करने और सामूहिक सहयोग की भावना अपनाने की प्रेरणा देती है। वर्तमान समय में पर्यावरण प्रदूषण, जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच इस पर्व का महत्व और बढ़ जाता है। हमें जल, जंगल, जमीन और जीव-जंतुओं की रक्षा का संकल्प लेना चाहिए।

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