करवाचौथ अटूट प्रेम, विश्वास और अखंड सौभाग्य का पावन पर्व : संजय सर्राफ
एबीएन सोशल डेस्क। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय संस्कृति में पर्व-त्योहार केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि पारिवारिक संबंधों में प्रेम, विश्वास और समर्पण की भावना को सुदृढ़ करने के माध्यम भी हैं। करवाचौथ ऐसा ही एक पावन पर्व है, जो पति-पत्नी के अटूट प्रेम, दांपत्य जीवन की मधुरता और अखंड सौभाग्य की मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं तथा रात्रि में चंद्रदेव के दर्शन और पूजन के पश्चात व्रत का पारण करती हैं। इस वर्ष करवाचौथ का पर्व 29 अक्टूबर दिन गुरुवार को मनाया जायेगा। हिंदू पंचांग के अनुसार यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन प्रात:काल सरगी ग्रहण करने के पश्चात व्रत का संकल्प लिया जाता है।
महिलाएं दिनभर उपवास रखकर संध्या के समय भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता की पूजा-अर्चना करती हैं। करवाचौथ का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत व्यापक है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से पति-पत्नी के जीवन में सुख, शांति, प्रेम और समृद्धि बनी रहती है। यह पर्व नारी के त्याग, तपस्या, श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। करवाचौथ में मिट्टी के करवे का विशेष महत्व है।
करवे में जल भरकर पूजा की जाती है तथा चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। चंद्रमा को शीतलता, शांति और सौम्यता का प्रतीक माना गया है। करवाचौथ से जुड़ी वीरवती की कथा अत्यंत प्रचलित है। वीरवती सात भाइयों की इकलौती बहन थी। उसने अपने पति की लंबी आयु के लिए करवाचौथ का व्रत रखा। भूख-प्यास से व्याकुल बहन की स्थिति देखकर भाइयों ने छलपूर्वक पेड़ पर दीपक जलाकर चंद्रमा निकलने का भ्रम उत्पन्न कर दिया।
वीरवती ने उसे चंद्रमा समझकर अर्घ्य दिया और भोजन कर लिया। इसके परिणामस्वरूप उसके पति की मृत्यु हो गयी। बाद में वीरवती ने पूर्ण श्रद्धा और विधिपूर्वक व्रत किया, जिससे उसका पति पुन: जीवित हो उठा। यह कथा व्रत की निष्ठा, संकल्प और अटूट विश्वास का संदेश देती है। करवा चौथ का मूल उद्देश्य दांपत्य जीवन में प्रेम, समर्पण, विश्वास और पारस्परिक सम्मान को मजबूत करना है।
बदलते समय में पति-पत्नी दोनों द्वारा एक-दूसरे के स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करना इस पर्व को और अधिक आत्मीय बना रहा है। करवाचौथ भारतीय संस्कृति की उस परंपरा का प्रतीक है, जिसमें रिश्तों की मजबूती और परिवार की खुशहाली को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।