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मीराबाई जयंती कृष्ण भक्ति, प्रेम और समर्पण की अमर साधिका

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मीराबाई जयंती कृष्ण भक्ति, प्रेम और समर्पण की अमर साधिका
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भक्ति की शक्ति और आध्यात्मिक चेतना की प्रतीक थीं संत मीराबाई : संजय सर्राफ 

एबीएन सोशल डेस्क। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि मीराबाई जयंती प्रतिवर्ष आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा अर्थात् शरद पूर्णिमा के अवसर पर परंपरागत रूप से मनायी जाती है। इस वर्ष मीराबाई जयंती 26 अक्टूबर दिन सोमवार को मनाई जायेगी। मीराबाई की जन्मतिथि का कोई प्रमाणित ऐतिहासिक अभिलेख उपलब्ध नहीं है, लेकिन भारतीय जनमानस में शरद पूर्णिमा को उनकी जयंती के रूप में मनाने की परंपरा प्रचलित है। 

यह दिवस भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उनकी अनन्य भक्ति, अटूट आस्था और आध्यात्मिक साधना का स्मरण कराता है। राजघराने में जन्म, कृष्णभक्ति में समर्पित जीवन संत मीराबाई का जन्म लगभग 1498 ईस्वी में राजस्थान के मेड़ता क्षेत्र के कुड़की गांव में एक राजपूत परिवार में हुआ माना जाता है। बचपन से ही उनका मन भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में रमा रहता था। 

लोक प्रचलित कथा के अनुसार, बाल्यावस्था में श्रीकृष्ण की प्रतिमा के प्रति उनका विशेष लगाव उत्पन्न हुआ, जो आगे चलकर उनकी जीवन-साधना का आधार बन गया। मीराबाई का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से हुआ था। राजसी वैभव और पारिवारिक मर्यादाओं के बीच रहते हुए भी उनकी कृष्ण भक्ति निरंतर प्रगाढ़ होती गयी। उन्होंने सांसारिक बंधनों और सामाजिक विरोध की परवाह किये बिना स्वयं को श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया। 

उनके जीवन से जुड़ी अनेक घटनाएं भक्तिपरक लोककथाओं में वर्णित हैं, जो उनकी अटूट आस्था और निर्भीकता को दर्शाती हैं। मीराबाई हिंदी भक्ति साहित्य की महान संत-कवयित्री थीं। उनके पदों में प्रेम, विरह, समर्पण और ईश्वर के प्रति अनन्य निष्ठा का अनुपम चित्रण मिलता है। मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई जैसी प्रसिद्ध पंक्ति उनकी एकनिष्ठ कृष्णभक्ति का सशक्त परिचायक है। 

उनके भजन आज भी मंदिरों, सत्संगों और धार्मिक आयोजनों में श्रद्धापूर्वक गाए जाते हैं।मीराबाई जयंती का उद्देश्य उनके आध्यात्मिक आदर्शों, भक्ति भावना और जीवन मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाना है। इस अवसर पर मंदिरों में भजन-कीर्तन, सत्संग, प्रवचन तथा धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु उनके पदों का गायन कर भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। 

मीराबाई का जीवन संदेश देता है कि सच्ची भक्ति के लिए धन, वैभव और सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि निर्मल हृदय, अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण आवश्यक है। उनका व्यक्तित्व नारी आत्मसम्मान, स्वतंत्र आध्यात्मिक चेतना और दृढ़ संकल्प का भी प्रेरणास्रोत है। इस प्रकार, मीराबाई जयंती केवल एक संत-कवयित्री की स्मृति का दिवस नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति, त्याग और मानवीय संवेदनाओं को आत्मसात करने का पावन अवसर है।

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