टीम एबीएन, रांची। सूर्य नमस्कार तीन तत्वों से गठित है आकृति, ऊर्जा और लय। 12 आसनों की आधारशिला पर इस अभ्यास की रचना की गई है। आसनों की यह शृंखला सूक्ष्म शक्ति प्राण का उत्पादन करती है, जिससे अतींद्रिय शरीर सक्रिय होता है। स्थिरता पूर्वक लयबद्ध क्रम मे इसका अभ्यास करने से ब्रह्मांड को लयबद्धता दिन के 24 घंटे, वर्ष के 12 राशि चक्र और शरीर के जैविक लय प्रतिबिंबित होती है। आकृति और लय का यह समायोजन शरीर और मन को एक परिवर्तनकारी शक्ति उत्पन्न करता है, जिससे एक पूर्ण और अधिक गतिशील जीवन का निर्माण होता है। इसलिए नमस्कार के अभ्यास के लिए सबसे उपयुक्त सूर्योदय का समय है। जब हम देर शाम को सूर्य नमस्कार करते हैं तो हमारे शरीर का रक्त संचार बढ़ जाता है, जिससे मस्तिष्क अधिक सक्रिय हो जाता है। इसके फलस्वरूप रात को जब हम सोते हैं तो हमें बेचैनी महसूस होती है एवं नींद नहीं आती, जिससे तनाव होता है। नींद पूरी नहीं होने के कारण दूसरे दिन भी हम तनाव में रहते हैं। इसलिए माना गया है कि देर शाम को सूर्य नमस्कार ना करके उसकी जगह चंद्र नमस्कार करना चाहिए। आसनों का क्रम सूर्य नमस्कार जैसा ही है अंतर इतना है कि अश्व संचालन के पश्चात अर्धचंद्रासन किया जाता है, यह संतुलन और एकाग्रता का विकास करता है। जिस प्रकार से सूर्य नमस्कार की 12 स्थितियां वर्ष की 12 राशियों और कलाओं से संबंधित है उसी प्रकार चंद्र नमस्कार की 14 स्थितियां का संबंध चंद्रमा की 14 कलाओं के साथ है। चांद पंचांग में पूर्णिमा के पूर्व के चौदह दिन शुक्ल पक्ष और पूर्णिमा के बाद के 14 दिन कृष्ण पक्ष कहलाते हैं।