- शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर को
- चंद्रमा की सोलह कलाओं, मां लक्ष्मी की आराधना और श्रीकृष्ण की महारास का पावन पर्व : संजय सर्राफ
एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय सनातन संस्कृति में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। वर्षा ऋतु की विदाई और शरद ऋतु के आगमन के बीच आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व प्रकृति की सुंदरता, चंद्रमा की शीतल चांदनी, भक्ति और समृद्धि का प्रतीक है।
इस वर्ष शरद पूर्णिमा का पर्व 25 अक्टूबर दिन रविवार को मनाया जाएगा। पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को पूर्वाह्न 11 बजकर 55 मिनट से प्रारंभ होकर 26 अक्टूबर को प्रातः 9 बजकर 41 मिनट तक रहेगी।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस रात आकाश में चमकने वाला पूर्ण चंद्रमा शीतलता, शांति, पवित्रता और सकारात्मकता का संदेश देता है।
मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी अमृत के समान गुणकारी होती है। इसी विश्वास के कारण इस दिन चंद्रमा की पूजा की जाती है तथा उसकी चांदनी में खीर रखने की परंपरा प्रचलित है। श्रद्धालु खीर को चंद्रमा के प्रकाश में रखकर अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। शरद पूर्णिमा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य महारास लीला से भी है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी मनोरम रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था। चंद्रमा की उज्ज्वल चांदनी में संपन्न यह दिव्य लीला प्रेम, समर्पण और भक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक मानी जाती है। श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से प्रत्येक गोपी को यह अनुभूति कराई कि वे उनके साथ ही नृत्य कर रहे हैं।
यह प्रसंग जीवात्मा और परमात्मा के मिलन तथा अनन्य प्रेम का आध्यात्मिक संदेश देता है। शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस अवसर पर मां लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि इस रात्रि देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागरण करने वाले भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं।
कोजागरी शब्द का भाव है-कौन जाग रहा है इसी विश्वास के कारण श्रद्धालु रात्रि में दीप प्रज्वलित कर मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं तथा सुख-समृद्धि, धन-धान्य और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।इस दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी तथा चंद्रदेव की पूजा करते हैं।
संध्या के समय दीप प्रज्वलित कर आरती की जाती है। घरों और मंदिरों में भजन-कीर्तन तथा धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। चावल और दूध से बनी खीर तैयार कर चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा है। बाद में इसे भगवान को अर्पित कर प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। यह परंपरा श्रद्धा, पवित्रता और परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम एवं एकता का प्रतीक है।
शरद पूर्णिमा का मूल संदेश जीवन में पवित्रता, संयम, भक्ति, प्रेम और सद्भाव को अपनाना है। यह पर्व हमें प्रकृति के सौंदर्य का सम्मान करने, ईश्वर के प्रति आस्था रखने तथा परिवार और समाज में सुख-शांति बनाए रखने की प्रेरणा देता है। मां लक्ष्मी की आराधना परिश्रम, सदाचार और संतोष के महत्व का स्मरण कराती है, जबकि श्रीकृष्ण की महारास लीला प्रेम और समर्पण का संदेश देती है।
इस प्रकार शरद पूर्णिमा केवल चंद्रमा की अनुपम छटा निहारने का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक चेतना, धार्मिक आस्था और पारिवारिक परंपराओं का अनुपम उत्सव है। यह पावन अवसर जन-जन के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मकता का संचार करने की प्रेरणा देता है।