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भारतीय संस्कृति का प्रमुख आधार गायत्री मंत्र पर चर्चा

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भारतीय संस्कृति का प्रमुख आधार गायत्री मंत्र पर चर्चा
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एबीएन सोशल डेस्क। गायत्री शक्तिपीठ सेक्टर टू में  आज यज्ञीय अनुष्ठान विधान समय गायत्री परिवार साधकों के बीच पूज्यवर श्रीगुरुदेव के लिखित गायत्री महाविज्ञान पुस्तक युग साहित्य पर चर्चा हुई। तदनुसार गायत्री महामंत्र की उपासना,साधना महिमा- महात्म्य, अनुष्ठान, प्रभाव, स्तुति,आराधना, व्याहृति, विशेषताएं, इसका अवतार (जयन्ती विवरण), ऋषियों, महामानवों की उपास्य व वर्णित व गायी गयी महिमा, आध्यात्मिक उपचार आदि  वर्णन के सार संक्षेप में चर्चा की गयी। गायत्री मंत्र को भारतीय संस्कृति का सबसे श्रेष्ठ मंत्र माना गया है। इसकी श्रेष्ठता, महानता का परिचय इसी बात से मिल जाता है कि यह संसार का सबसे प्राचीन उपासना मंत्र है, जब भारतीय संस्कृति ही विश्व संस्कृति थी। 

गायत्री मंत्र के बारे में सामान्य जनों से लेकर प्रबुद्ध स्तर तक के लोगों में गहन जिज्ञासा का भाव पाया जाता है। पूज्य गुरुदेव ने जो स्वरूप बताया है,उस का संक्षिप्त रूप से यज्ञ पुरोहित ने बताया  कि गायत्री मंत्र का स्वरूप एक प्रणव और तीन व्याहृति सहित है- ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात। 

इसमें निहित मूल गायत्री के 3 चरण, 9 शब्द, 24 अक्षर हैं। मूल गायत्री मंत्र तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात इतना ही है। इसी को त्रिपदा (तीन पद वाली) गायत्री की संज्ञा दी गई है। गायत्री मंत्र के ये तीन चरण-1 तत्सवितुर्वरेण्य, 2। भर्गो देवस्य धीमहि, 3। धियो यो न: प्रचोदयात के रूप में हैं। इन्हीं तीन चरणों के अंतर्गत 9 शब्द एवं 24 अक्षर समाये हुए हैं। 

गायत्री उपासना साधना इसी समग्र मंत्र से की जाती है। गायत्री महाविज्ञान के माध्यम से परम पूज्य गुरुदेव ने इसके अर्थ भावार्थ बताकर अपने तपोबल व संकल्प बल से सबके लिए दीक्षा लेकर सर्व जनहिताय सरल सहज सुबोधगम्य बनाया है। उक्त जानकारी गायत्री परिवार रांची के जय नारायण प्रसाद ने दी। 

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