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मोबाइल में सिमटती जिंदगी, अकेले होते बुजुर्ग और दिखावे की दौड़...

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मोबाइल में सिमटती जिंदगी, अकेले होते बुजुर्ग और दिखावे की दौड़...
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  • मोबाइल में सिमटती जिंदगी, अकेले होते बुजुर्ग और दिखावे की दौड़... आई ओपनर ने समाज को दिखाया आईना
  • अग्रसेन जयंती पर अनूठी पहल से उठे रिश्तों, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक विसंगतियों से जुड़े सवाल, अभिनय व मार्मिक संवादों ने झकझोरा
  • परियोजना निर्देशिका सीए वंदना अग्रवाल एवं काजल गुप्ता के संयोजन में सजी वैचारिक प्रस्तुतियां
  • निर्णायक मंडल ने प्रतिभागियों की रचनात्मकता और सामाजिक सरोकारों को सराहा

एबीएन न्यूज नेटवर्क, झुमरी तिलैया। समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि समस्याएं हमारी आंखों के सामने होती हैं, लेकिन उन्हें समस्या मानने और उनका समाधान खोजने की पहल कम ही लोग करते हैं। 

मोबाइल की स्क्रीन पर बढ़ती नजदीकियों के बीच अपनों से दूर होते रिश्ते, घरों में खामोशी से अकेलापन झेलते बुजुर्ग, दूसरों को खुश रखने के लिए खुद को भूलते लोग और दिखावे की होड़ में आर्थिक संतुलन खोते परिवार। इन सभी सवालों को जब मंच पर जीवंत किया गया, तो यह महज मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर बन गया। श्री अग्रसेन जयंती महोत्सव के अवसर पर आयोजित ‘आई ओपनर’ मंच ने समाज को उसकी ही तस्वीर दिखाते हुए यह संदेश दिया कि बदलाव की शुरुआत भाषणों से नहीं, बल्कि विचारों को व्यवहार में उतारने से होती है।

परियोजना निर्देशिका सीए वंदना अग्रवाल एवं काजल गुप्ता के संयोजन में आयोजित इस अनूठे कार्यक्रम में पारंपरिक भाषण प्रतियोगिता से हटकर सामाजिक समस्याओं को अभिनय, लघु नाटिका, डिजिटल दृश्य और प्रभावशाली संवादों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। प्रतिभागियों ने समाज की ज्वलंत समस्याओं को सामने रखने के साथ उनके व्यावहारिक समाधान भी सुझाए। कार्यक्रम की खासियत यह रही कि हर प्रस्तुति ने किसी न किसी सामाजिक विसंगति पर सवाल उठाया और दर्शकों को अपने व्यवहार तथा जीवनशैली पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।

मोबाइल की दुनिया से लेकर बुजुर्गों के अकेलेपन तक, हर प्रस्तुति ने छोड़ी छाप

सीए रूही संघई एवं प्रगति चौधरी ने आधुनिक जीवन में मोबाइल की बढ़ती दखलंदाजी और अपनों के बीच घटते संवाद को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

 उनकी प्रस्तुति ने इस सवाल को प्रमुखता से उठाया कि तकनीक के माध्यम से पूरी दुनिया से जुड़े रहने के बावजूद हम अपने ही परिवार से दूर क्यों होते जा रहे हैं। उमंग सिंघानिया एवं समूह ने जीवन की आपाधापी के बीच जीवन जीने के वास्तविक अर्थ और उसकी सार्थकता को रेखांकित किया। प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि सफलता की दौड़ में केवल मंजिल तक पहुंचना ही महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि जीवन के छोटे-छोटे पलों को जीना और रिश्तों को समय देना भी उतना ही जरूरी है।

मीना हिसारिया ने आधुनिक परिवारों में बुजुर्गों की उपेक्षा और उनके अकेलेपन के दर्द को मार्मिक तरीके से सामने रखा। प्रस्तुति ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया कि जिन माता-पिता ने अपना पूरा जीवन बच्चों के भविष्य को संवारने में लगा दिया, उनके जीवन की संध्या सम्मान, स्नेह और साथ के बजाय अकेलेपन में क्यों बीतनी चाहिए।

रिश्तों में मर्यादा, फिजूलखर्ची और खुद को भूल जाने की प्रवृत्ति पर उठे सवाल

अलका गुप्ता ने जीवन में एक हार से थकने के बजाए इसे जीवन की कुँजी बनाने की सलाह देते हुए, जरूरत पड़ने पर  ना को स्वीकार करने की अहमियत बताई। उन्होंने इस विषय के माध्यम से समझाया की ना भी उतना ही जरूरी है, जितना की हाँ। राशि बंसल एवं समूह ने नई पीढ़ी को अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार खर्च करने और फिजूलखर्ची से बचने का संदेश दिया। ‘चादर देखकर पैर फैलाने’ की सीख के माध्यम से प्रस्तुति ने दिखावे की संस्कृति के बीच आर्थिक समझदारी और भविष्य की जरूरतों के लिए बचत के महत्व को उजागर किया। 

कृतिका मोदी एवं प्रीति जगनानी ने अब और समझदार नहीं बनना विषय के माध्यम से हर परिस्थिति में समझौता करते रहने और दूसरों की अपेक्षाएं पूरी करने के लिए अपनी भावनाओं को दबाने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए। उनकी प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि समझदारी का अर्थ हमेशा चुप रहना या हर बात सहन करना नहीं है। अपनी भावनाओं को व्यक्त करना और आत्मसम्मान के लिए खड़ा होना भी उतना ही आवश्यक है।

गलतफहमियों को दूर करने और सकारात्मक सोच अपनाने का संदेश

शैलजा केडिया एवं समूह ने गलतफहमियों के कारण बिखरते पारिवारिक रिश्तों को बचाने के उपाय प्रस्तुत किए। संवादहीनता, अधूरी जानकारी और एक-दूसरे की बात समझने में हुई चूक किस तरह मजबूत रिश्तों में दरार पैदा कर सकती है, इसे प्रस्तुति के माध्यम से सामने रखा गया। साथ ही आपसी बातचीत, विश्वास और धैर्य को रिश्तों की मजबूती का आधार बताया गया।

रजनी खेतान ने विचारों की शक्ति और सकारात्मक दृष्टिकोण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि व्यक्ति की सोच उसके व्यवहार, निर्णय और जीवन की दिशा को प्रभावित करती है। सकारात्मक विचार न केवल स्वयं के जीवन में बदलाव ला सकते हैं, बल्कि परिवार और समाज में भी बेहतर वातावरण तैयार कर सकते हैं।

निर्णायक मंडल ने सराहा, समाज को सकारात्मक दिशा देने वाली पहल बताया

कार्यक्रम में निर्णायक मंडल की भूमिका शिक्षाविद अजय अग्रवाल एवं सीए प्रदीप हिसारिया ने निभाई। प्रतिभागियों की रचनात्मकता, संवाद शैली, सामाजिक प्रभाव और प्रस्तुत विषयों के समाधान पर आधारित इस आयोजन की देर शाम तक सराहना होती रही।अग्रवाल समाज के अध्यक्ष कैलाश चौधरी एवं सचिव संजीव खेतान ने कहा कि इस तरह के नवाचारी कार्यक्रम समाज को नई और सकारात्मक दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

सामाजिक समस्याओं को केवल शब्दों में उठाने के बजाय उन्हें प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करना और उनके समाधान पर विचार करना समय की आवश्यकता है। वहीं जयंती संयोजक मनोज पिलानिया, अंकित चौधरी, सह संयोजका नेहा हिसारिया, सारिका लड्ढा ने परियोजना निर्देशिकाओं के अभिनव विचार और कुशल आयोजन प्रबंधन की सराहना की।

गणमान्य लोगों ने की पहल की प्रशंसा

कार्यक्रम में महेश दारूका, संजय अग्रवाल, प्रदीप केडिया, मधुसूदन दारूका, जगदीश संघई, श्याम सुंदर सिंघानिया, प्रदीप बंसल, मनोज केडिया, दीपक सिंघानिया, अरविंद चौधरी, मुन्ना सुलतानिया, सुरेंद्र गुप्ता, राजू केडिया, गोपी किशन अग्रवाल, मीरा खाटुवाला, मंजू संघई, सीमा सरावगी सहित समाज के अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे समाज के विभिन्न वर्गों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया। 

आई ओपनर की सार्थकता इसी में रही कि मंच पर उठे सवाल सभागार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने हर व्यक्ति को अपने घर, अपने रिश्तों और अपने व्यवहार की ओर देखने का अवसर दिया। संदेश स्पष्ट था- समाज बदलने के लिए सबसे पहले अपनी सोच बदलनी होगी और बदलाव की शुरुआत किसी दूसरे से नहीं, स्वयं से करनी होगी।

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