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सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को

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सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को
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ज्ञात-अज्ञात पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का महापर्व : संजय सर्राफ 

एबीएन सोशल डेस्क। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि पितृपक्ष अपने समापन की ओर है। हिंदू धर्म में पितृपक्ष को अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण, तर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर माना गया है। पितृपक्ष की अंतिम तिथि सर्वपितृ अमावस्या कहलाती है। इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को मनायी जायेगी। अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर की रात्रि से प्रारंभ होकर 10 अक्टूबर की रात्रि तक रहेगी। 

सर्वपितृ अमावस्या को पितृ विसर्जनी अमावस्या, महालय अमावस्या और सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन विशेष रूप से उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने का अवसर है, जिनकी मृत्यु तिथि अथवा श्राद्ध की निर्धारित तिथि ज्ञात नहीं है। यदि किसी कारणवश पितृपक्ष की किसी तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका हो, तो सर्वपितृ अमावस्या को सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक श्राद्ध कर्म किया जाता है। 

धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष में पितरों का स्मरण कर उनके निमित्त जल, तिल, पिंड, अन्न आदि अर्पित किये जाते हैं। सर्वपितृ अमावस्या को पितरों की विदाई का दिन माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कर पूर्वजों के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। तर्पण के माध्यम से जल अर्पित करना और पिंडदान के माध्यम से अन्न का अर्पण करना इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इस दिन प्रात: स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पितरों का स्मरण करना चाहिए। परिवार की परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार श्राद्ध कर्म, तर्पण एवं पिंडदान किया जाता है। ब्राह्मण भोजन, जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र का दान, गौ सेवा तथा अन्य सेवा कार्य भी श्रद्धा के साथ किए जाते हैं। अनेक परिवार इस अवसर पर कौआ, गाय और अन्य जीवों को भोजन कराकर भी पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं। 

सर्वपितृ अमावस्या का उद्देश्य केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नयी पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कारों और पूर्वजों के योगदान से जोड़ने का अवसर भी है। हमारे जीवन, परिवार और संस्कारों को आकार देने वाले पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करना भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण परंपरा रही है। यह पर्व हमें श्रद्धा, सेवा, दान, कृतज्ञता और पारिवारिक संस्कारों का संदेश देता है। 

सर्वपितृ अमावस्या वास्तव में उन सभी पूर्वजों को स्मरण करने का दिन है, जिनके नाम और तिथियां समय के साथ विस्मृत हो गई हों। इसलिए यह तिथि पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के साथ-साथ परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और मंगल की कामना करने का भी महत्वपूर्ण अवसर है। पितृपक्ष का यह अंतिम दिन हमें यह संदेश देता है कि अपने पूर्वजों को स्मरण करना केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और विरासत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी है।

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