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लोगों को आज भी आकर्षित करतीं हैं बोड़ेया के मदन मोहन मंदिर की कलाकृतियां

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लोगों को आज भी आकर्षित करतीं हैं बोड़ेया के मदन मोहन मंदिर की कलाकृतियां
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टीम एबीएन, रांची। मदन मोहन मंदिर की स्थापना काल क्या है तथा कितने दिनों में यह मंदिर बनकर तैयार हुआ, इन तिथियों की जानकारी स्पष्टत: मंदिर में रखे शिलापट्ट में उत्कीर्ण शिलालेख से मिलती है। यह शिलालेख प्रवेश द्वार के ठीक सामने मंदिर के चबूतरे पर गर्भगृह की दीवार के दक्षिणी भाग में रखा देखा जा सकता है। दो शिलालेखों में ये तथ्य लिखे मिलते हैं। 

इनके अतिरिक्त गर्भगृह के दरवाजे पर उत्कीर्ण दिन-तारीख तथा राजा द्वारा प्रदत्त ताम्रपत्र जो लक्ष्मीनारायण तिवारी को प्राप्त हुआ था, साक्ष्य के रूप में मौजूद हैं। इन्हीं आधारी तथ्यों का उल्लेख विभिन्न पुस्तकों में भी दिखाई पड़ता है जैसे-डिस्ट्रिकट गजेटियर, रांची मुंडाज एंड देयर कंट्री, बिहार थ्रू एजेज, छोटानागपुर का इतिहास, लिस्ट आॅफ मोनुमेंटस इन दि छोटानागपुर, छोटानागपुर के प्राचीन स्मारक और झारखंड की रूपरेखा तथा झारखंड का भूगोल आदि पुस्तकें उल्लेखनीय हैं। 

प्रस्तुत है क्रमश: शिलालेखों की पंक्तियां 

  • एक शिलालेख जो छोटी आकृत्ति में है, इसमें निम्न पंक्तियां उत्कीर्ण हैं : 
  • श्री राम राज्य। संवत सत्रह सइ बाइस। 
  • बैशाख सुदि दशमी रजनीश। 
  • श्री रघुनाथ नरेश विराज। 
  • लक्ष्मी नारायण ईश्वर माठसाज। 

दूसरे शिलालेख की पंक्तियां निम्नवत हैं : 

  • श्री मदन मोहन जी : शुभ संवत 1722 समय वैसाख सुदी दशमी 10 के श्रीश्री मदन मोहनक शुभा दावा देयाल श्री संवत 1725 समय सावन सुदी दशमी 10 के दरवाजा और छरदेवाली दावा देल तैयार भेल संवत 1739 तेकर लगीत भेल रूपैया 14001 चौदह हजार एक रूपैया। ताकर हिन्दू मठ दरयाज छारदेयाली ढहायाय से गाइक रक्त पीयय ब्रह्मण मारलेक हत्या गुरू मारलेक हत्या ताकर हए। 
  • मुसलमान मय मठ दरयाज छारदेवाली ढाहायाय से सूअर खाए आखुर मारलक ओ पीरक धारा शुअर कहरा डारलक दोष तेहि-मुसलमानक (हए) तेयारी लक्ष्मीनारायण भगवत इ विनति लिखाय राखल हय। कारीगर अनिरूद्ध विनती सांच हय 

उपर्युक्त पंक्तियों की सरल व्याख्या आवश्यक है। शिलालेख में श्री राम राज्य लिखने का तात्पर्य आरंभिक संबोधन तो माना जा सकता है लेकिन यह भी संकेत मिलता है कि मंदिर का निर्माण औरंगजेब काल में भी निर्विघ्न संपन्न होना। निश्चय ही बोड़ेया और आसपास का वातावरण शांतिपूर्ण रहा होगा। नागवंशी राजा का काल मुगल सल्तनत के आतंक से दूर रहा होगा और यहां मंदिर निर्माण में पंडित लक्ष्मी नारायण तिवारी को निष्कलंक, निष्कंटक और निश्शंक व विमल परिवेश मिला होगा। 

आगे यह लिखा गया है कि मंदिर की नीव का शुभारंभ संवत 1722 (1665 ई.) के वैशाख शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को किया गया। इस अवसर पर राजा रघुनाथ शाही उपस्थित थे। लक्ष्मी नारायण तिवारी ने नींव रखी। 

दूसरे शिलालेख में यह स्पष्ट किया गया है कि मदन मोहन मंदिर की नीव 1722 संवत (1665 ई.) में वैशाख शुक्ल पक्ष दशमी को रखी गयी थी। संवत 1725 (1668 ई.) के श्रावण शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को अर्थात् तीन वर्ष तीन माह के बाद चारदीवारी एवं दरवाजे की नींव रखी गयी थी। मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ संवत 1739 (1682 ई.) में। अर्थात् मंदिर को बनकर पूर्ण होने में कुल सत्रह वर्ष लगे। कहीं-कहीं इस लेखन का यह अर्थ निकाला गया है कि मंदिर का निर्माण तीन वर्ष में पूरा हो गया जबकि चारदीवारी पूर्ण होने में 14 वर्ष लगे। लेकिन ठीक से शिलालेख पढ़ें तो अर्थ स्पष्ट है कि 1665 में मंदिर की नींव पडी, 1668 में चारदीवारी की नींव पडी और 1672 ई. में ये सब पूर्ण हुए। मंदिर के निर्माण में कुल 14001 (चौदह हजार एक रुपये) की लागत आयी। 

शिलालेख की आगे की पंक्तियों से यह ज्ञात होता है कि तत्कालीन हिन्दुस्तान के शासक औरंगजेब की कट्टर धर्मांधता से मंदिर निर्माता लक्ष्मी नारायण तिवारी जरूर परेशान हुए होंगे। उनके मन में मंदिर को क्षति पहुंचाने की शंका अवश्य उत्पन्न हुई होगी। यही कारण है कि उन्होंने शिलालेख में शपथ लिखवाया कि जो कोई भी हिंदू मंदिर के दरवाजे और चारदीवारी को किसी भी प्रकार से ढाहने का अर्थात नुकसान पहुंचाने का प्रयत्न करेगा उसे गाय के रक्त पान का, ब्राह्मण हत्या का और गुरू की हत्या का पाप लगेगा। 

अगर कोई मुसलमान होकर मंदिर के दरवाजे, चारदीवारी को ढाहने का या किसी तरह के नुकसान पहुंचाने का प्रयास करेगा तो उसे सूअर खाने का, आखुर (सुअर) मारने का और किसी पीर की थाली में सूअर मांस परोसने का घोर पाप लगेगा। यह निवेदन लक्ष्मी नारायण तिवारी ने लिखवाया है। मंदिर का कारीगर अनिरूद्ध भी कहते हैं कि यह लिखा सत्य है। 

इस प्रकार शिलालेखों में अंकित तिथियों से ज्ञात होता है कि मदन मोहन मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी में हुआ था। यह औरंगजेब का शासन काल था तथा छोटानागपुर में इस समय राजा रघुनाथ शाही विराजमान थे। नागवंशी राजाओं की राजधानी इस समय खुखरा से ढोइसा गढ़ में स्थापित की जा चुकी थी। 

इस प्रसंग में लक्ष्मी नारायण तिवारी को राजा द्वारा प्रदत्त ताम्रपत्र का उल्लेख करना आवश्यक है। ताम्रपत्र अभी भी बोड़ेया के तिवारी परिवार में उपलब्ध है। यह अभी दो टुकड़ों में देखा जा सकता है। प्रस्तुत है ताम्रपत्र में उल्लेखित पंक्तियों का हू-ब-हू अनुकृति या प्रतिलिपि श्री राम 

नागवंशी राजाओं की खुदी हुई राजमुहर मुहर की बगल में लिखा है श्री मदन मोहन 

संवत 1733 साल समै माघ सुदी 13 रोज सुभदी न व्रीत पत्र लीखते भसोसती श्री प्रबल प्रतापों उदीत परताप ताप सम्पन्न महाराजाधीराज श्री रघुनाथ शाहीदेव तेवारी श्री लक्ष्मी न्याराऐनक ठाकुर श्री श्री देवा कही देवोत्रव्रीत के देल मौजा बोड़ेया पहिले तेवारीक ब्रीत हए से गांव फेरीक श्री श्री कही हम व्रीति के देल जलकर पतकर गाछ माछ प्रजा पुर चतुर सीमा बेतलव के देल देल दीनहुजुदन समस्त बाते जे पेल हीन्दु होएपेले तो गाए खाए तुरूक होएपेले सुअर खाए इअथे साख्खी महाराज कुमार ठाकुर श्री इन्दु साही ब्रह्मचारी गोसाई श्री हरीनाथ तथा काजी श्री जानकी रामदास तथा ठाकुर श्री चतुरभुज राय तथा श्री पुरोहित गनपति तथा पंडे श्री बलपति राय तथा पान्डे श्री लक्ष्मी रामदास तथा बीरभद्र दास तथा भंडारी श्री लालराय दास खात अखौरी श्री वंशीदास साखी गणेश पंडित मोकाम डोइसानगर साखी बेनीदत्त ठाकुर साखी तेवारी रामजीठ साखी गुरू विधनेश। 

उपर्युक्त ताम्रलिपि का अर्थ निम्नवत है 

संवत 1733 (1682 ई.) के माघ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी के शुभ दिन में यह वृत्तिपत्र लिखा जा रहा है कि प्रबल प्रतापी महाराजा श्री रघुनाथ शाही ने श्री लक्ष्मी नारायण तिवारी के ठाकुर श्री को श्री देवता कहकर देवोत्तर में पूर्व से प्राप्त बोड़ेया ग्राम तिवारी जी की वृत्ति है जिसे फिर से वृत्ति (भरण-पोषण हेतु धन) के रूप में जल, वृक्ष, प्रजा, गांव के चारों सीमा तक बिना मांगे प्रदान किया। दिये हुए सभी बातों से कोइ मना करे तो हिन्दु को गौ खाने के तथा मुसलमान को सूअर खाने के समान होगा। इसमें साक्षी हैं महाराज कुमार ठाकुर इंदु शाही, ब्रह्मचारी गोसाई श्री हरिनाथ तथा काजी और श्री जानकी राम दास, ठाकुर श्री चतुर्भुज राय, पुरोहित श्री गणपति, पांडे श्री बलपति राय, पांडे श्री लक्ष्मी राम दास, वीरभद्र दास, भंडारी श्री लाल राय दास, पत्र अखौरी श्री वंशीदास, साक्षी गणेश पंडित ग्राम डोइसानगर, साक्षी बेनीदत्त ठाकुर, साक्षी तेवारी रामजीठ, साक्षी गुरू विघ्नेश। 

यह ताम्र पत्र महाराजा ने लक्ष्मीनारायण तिवारी को उस समय सौंपा था जब मंदिर निर्माण का कार्य चल रहा था। इस ताम्र पत्र प्राप्ति के छ: वर्ष उपरांत मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ था। यह भी प्रमाणित होता है कि लक्ष्मीनारायण तिवारी का संपर्क राजाओं से था और राजाओं को यहाँ के मंदिर निर्माण की सूचना थी। 

नागवंशी राजाओं का काल देखा जाए तो 45वें राजा दुर्जनशाल ने डोइसा में राजधानी बसायी थी। इनका राजकाल था 1550 ई. से 1590 ई. तक। इसके वाद 48वें राजा के रूप में रामशाह 1646 ई. से 1670 ई. तक रहे। यहाँ 1665 ई. में मंदिर का निर्माण आरम्भ हुआ था। 49वें राजा थे रघुनाथ शाही जिनका राजकाल था 1671 ई. से 1706 ई.। इसी समय 1682 ई. में मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ था । 

मंदिर का आकार / शिल्प 

मदन मोहन मंदिर की भव्यता का आभास इसके आकार के विवरण से ही प्राप्त होता है। प्रस्तुत है क्रमश: चारदीवारी या परकोटे, प्रवेश द्वार, चबूतरा, गर्भगृह, गर्भगृह का द्वार, गुम्बद आदि का विवरण : 

चारदीवारी / परकोटा 

मदन मोहन मंदिर के चारों ओर 3 फीट 5 इंच मोटी दीवार दी गयी है जिसे चारदीवारी या परकोटा कहा जाता है। इस परकोटे की लंबाई बाहर से उत्तर दक्षिण 76 फीट (115 कड़ी) तथा पूरब पश्चिम लम्बाई 112 फीट (170 कड़ी) है। मंदिर परिसर परकोटे के अनुसार 8512 वर्ग फीट अर्थात 19.54 डिसमिल क्षेत्र में विस्तृत है। 

ये हैं आकर्षण का केंद्र 

  • प्रवेश द्वार 
  • मंदिर का चबूतरा 
  • स्तंभ 
  • गर्भगृह 
  • गर्भगृह की ऊंचाई 
  • शिखर 
  • जलकूप 
  • तुलसी मंच 
  • मंदिर का पश्चभाग 
  • प्रसाद गृह 
  • डोल चबूतरा 
  • कलुआ महादेव 
  • विग्रह / मूर्ति
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