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पर्यूषण महापर्व में धर्म और जीवन जीने की कला पर हुआ प्रेरक प्रवचन

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पर्यूषण महापर्व में धर्म और जीवन जीने की कला पर हुआ प्रेरक प्रवचन
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एबीएन सोशल डेस्क। श्री साधुमार्गी जैन संघ द्वारा आयोजित पर्यूषण महापर्व के धार्मिक कार्यक्रमों में स्वाध्यायी जी ने धर्म और जीवन जीने की कला विषय पर प्रेरणादायी प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि संतों का दर्शन, उनकी वाणी का श्रवण तथा उनके द्वारा बताये गये छोटे-छोटे व्रत और नियम भी व्यक्ति के जीवन को सकारात्मक दिशा देकर उसमें बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। 

अंत:गड़ सूत्र के वाचन के दौरान स्वाध्यायी जी ने माता देवकी के जीवन के अत्यंत मार्मिक प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जब माता देवकी के छह पुत्रों की मृत्यु हुई, तब एक मां के रूप में उनके मन में यह भाव नहीं आया कि मेरे बच्चे कैसे मर गए? बल्कि उनके मन में यह विचार था कि अच्छा हुआ, मेरे भाई कंस को मेरे बच्चों को मारने का पाप नहीं करना पड़ा। अपने बच्चों को खोने के असहनीय दु:ख के बावजूद माता देवकी के मन में अपने भाई के प्रति दुर्भावना नहीं आई। यह प्रसंग क्षमा, करुणा और निर्मल भावनाओं की प्रेरणा देता है। 

स्वाध्यायी जी ने आगे बताया कि माता देवकी के छह पुत्रों का पालन-पोषण सुरसा के यहां हुआ। बड़े होने पर उन्होंने भगवान अरिष्टनेमी से दीक्षा ग्रहण की और बेले-बेले की तपस्या करते हुए साधना के मार्ग पर आगे बढ़े। एक बार द्वारका नगरी में विहार करते हुए वे माता देवकी के महल पहुंचे और भिक्षा की मांग की। भगवान अरिष्टनेमी ने जब माता देवकी को बताया कि ये साधु उनके ही पुत्र हैं, तो माता की ममता उमड़ पड़ी और वात्सल्य का भाव जाग उठा। 

उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने जीवन और मन को बदलना है। व्यक्ति को जो भी प्रत्याख्यान, व्रत या नियम लेना चाहिए, उसे पूर्ण करने का संकल्प भी रखना चाहिए। छोटे-छोटे नियमों का दृढ़ता से पालन व्यक्ति के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। 

उन्होंने भगवान राम के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि अपने वचन को पूरा करने के लिए भगवान राम ने 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया। इससे हमें अपने संकल्प और वचन के प्रति दृढ़ रहने की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को जीवन में हमेशा यह भाव रखना चाहिए कि जो होता है, अच्छे के लिए होता है। विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना ही जीवन को सुखी और सार्थक बनाता है। 

कार्यक्रम के दौरान स्वाध्यायी जी द्वारा रामामृतम ध्यान का भी आयोजन कराया गया, जिसमें उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने सहभागिता की। कार्यक्रम का मंच संचालन राजेश पींचा ने किया। इस अवसर पर मूल चंद सुराणा, हुक्मी चंद चोरड़िया, उत्तम कोठारी, सुमन बच्छावत, तेरापंथ सभा रांची के अध्यक्ष श्री अमर चंद जी बैगानी एवं मंत्री श्री विनोद जी बेगवानी सहित 100 से अधिक श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। उक्त जानकारी उत्तम जैन ने दी।

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