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संतान सुख परिवार की समृद्धि और भगवान विष्णु की आराधना का पावन पर्व है सावन पुत्रदा एकादशी: संजय सर्राफ

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संतान सुख परिवार की समृद्धि और भगवान विष्णु की आराधना का पावन पर्व है सावन पुत्रदा एकादशी: संजय सर्राफ
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एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है। इस वर्ष सावन पुत्रदा एकादशी 23 अगस्त दिन रविवार को मनाई जाएगी। यह श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी है और भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। 

पुत्रदा का अर्थ है-संतान प्रदान करने वाली। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्रत संतान की कामना,संतान के सुख-स्वास्थ्य, दीर्घायु और परिवार की समृद्धि के लिए रखा जाता है। हालांकि आधुनिक संदर्भ में इस पर्व का संदेश केवल पुत्र प्राप्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि संतान के उज्ज्वल भविष्य, अच्छे संस्कार, सुख-शांति और परिवार के मंगल की प्रार्थना से भी जुड़ा है। 

वर्ष में दो एकादशियां पुत्रदा एकादशी के नाम से जानी जाती हैं- एक पौष शुक्ल पक्ष में और दूसरी श्रावण शुक्ल पक्ष में सावन पुत्रदा एकादशी की कथा महिष्मती नगरी के राजा महाजित से जुड़ी है। राजा अत्यंत धर्मपरायण और प्रजावत्सल था, लेकिन संतानहीन होने के कारण दुखी रहता था। एक दिन उसके मंत्री और प्रजा ऋषि-मुनियों के पास पहुंचे और राजा की समस्या का समाधान पूछा। 

महर्षि लोमश ने ध्यान करके बताया कि पूर्व जन्म में राजा से अनजाने में एक ऐसा कर्म हुआ था, जिसके कारण उसे इस जन्म में संतान सुख से वंचित रहना पड़ा। महर्षि ने राजा को श्रावण शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का व्रत करने तथा भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करने की सलाह दी। राजा ने श्रद्धा और नियमपूर्वक एकादशी व्रत किया। कथा के अनुसार व्रत के पुण्य प्रभाव से उसे संतान सुख प्राप्त हुआ और उसके घर एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। 

इसी कारण इस एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा गया। एकादशी के दिन प्रात: स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लिया जाता है। भगवान विष्णु को पीले पुष्प, तुलसीदल, फल, पंचामृत और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार निर्जल, जलाहार अथवा फलाहार व्रत रखते हैं। 

दिनभर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, भजन-कीर्तन और कथा-श्रवण किया जाता है। रात्रि जागरण और हरिनाम संकीर्तन का भी विशेष महत्व माना गया है। अगले दिन द्वादशी में उचित समय पर पारण कर दान-पुण्य और जरूरतमंदों को भोजन कराने की परंपरा है। सावन पुत्रदा एकादशी मनुष्य को संयम, श्रद्धा, सदाचार, सेवा और करुणा का संदेश देती है।

इसकी कथा यह भी सिखाती है कि प्रत्येक जीव के प्रति दया और संवेदना रखनी चाहिए तथा अपने कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए। भगवान विष्णु की आराधना के साथ परिवार के सुख, संतान के उज्ज्वल भविष्य और समाज में सद्भाव की कामना इस पर्व को विशेष बनाती है।

इस प्रकार सावन पुत्रदा एकादशी केवल एक धार्मिक व्रत नहीं बल्कि परिवार, संस्कार, सेवा और आध्यात्मिक अनुशासन का पर्व है। श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि, संतान के कल्याण और जीवन में सद्बुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं।

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