आध्यात्मिक उन्नति, पुण्य और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति का दुर्लभ पर्व : संजय सर्राफ
एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि सनातन धर्म में एकादशी व्रतों का विशेष महत्व माना गया है, किंतु परमा एकादशी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह एकादशी केवल अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में आती है, जो लगभग तीन वर्ष में एक बार पड़ता है।
इस वर्ष परमा एकादशी 11 जून दिन गुरुवार को मनायी जायेगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की आराधना के लिए समर्पित है और इसे करने से मनुष्य को आध्यात्मिक शांति, सुख-समृद्धि तथा पापों से मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है पौराणिक कथाओं में वर्णित है कि परमा एकादशी व्रत का पालन करने से जीवन की अनेक बाधाएं दूर होती हैं और व्यक्ति के भीतर संयम, भक्ति तथा सदाचार की भावना विकसित होती है।
परमा शब्द का अर्थ है-श्रेष्ठ या सर्वोच्च। इसी कारण यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी मानी गयी है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार अधिक मास में किये गये जप, तप, दान और व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन प्रात: स्नान कर भगवान विष्णु का पूजन, तुलसी अर्पण, विष्णु सहस्रनाम का पाठ तथा व्रत का संकल्प लिया जाता है।
श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार उपवास रखते हैं तथा गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र एवं अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करते हैं। धार्मिक परंपराओं में दान और सेवा को इस व्रत का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। परमा एकादशी का मुख्य उद्देश्य केवल उपवास करना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आत्मसंयम और मानव सेवा की भावना को जागृत करना है।
यह पर्व हमें लोभ, क्रोध और अहंकार जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों से दूर रहकर सत्य, करुणा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। साथ ही यह संदेश भी देता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए भक्ति के साथ-साथ सद्कर्म और परोपकार भी आवश्यक हैं। आज के भौतिकवादी युग में परमा एकादशी का महत्व और भी बढ़ जाता है।
यह पर्व हमें जीवन में संतुलन, नैतिकता और आध्यात्मिक चेतना बनाये रखने की प्रेरणा देता है। श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत व्यक्ति, परिवार और समाज में सुख, शांति तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाला माना गया है। यही कारण है कि परमा एकादशी को सनातन संस्कृति के सबसे पावन और कल्याणकारी व्रतों में गिना जाता है।