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पुरुषोत्तम अधिक मास 17 मई से 15 जून तक

पुरुषोत्तम अधिक मास 17 मई से 15 जून तक
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जीवन में आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति, भक्ति, साधना और पुण्य प्राप्ति का दिव्य अवसर : संजय सर्राफ 

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद झारखंड सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि सनातन धर्म में पुरुषोत्तम अधिक मास ज्येष्ठ मास का अत्यंत विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व माना गया है। इस वर्ष पुरुषोत्तम अधिक मास 17 मई से प्रारंभ होकर 15 जून तक रहेगा। 

हिंदू पंचांग के अनुसार यह अतिरिक्त मास लगभग प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार आता है। जब किसी चंद्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती, तब उस मास को अधिक मास कहा जाता है। भगवान विष्णु ने इस मास को अपना नाम पुरुषोत्तम प्रदान किया, इसलिए इसे पुरुषोत्तम अधिक मास कहा जाता है। यह मास भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना, भक्ति, तप, दान और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ काल माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन समय में अधिक मास को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता था। इससे दुखी होकर अधिक मास भगवान विष्णु की शरण में पहुंचा। तब भगवान विष्णु ने उसे अपना नाम पुरुषोत्तम देकर सभी महीनों में श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया। तभी से यह मास अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना जाने लगा। पुराणों में भी पुरुषोत्तम मास की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है।

इस मास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किए गए जप, तप, व्रत, दान, पूजा-पाठ और सत्कर्मों का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। श्रद्धालु इस अवधि में भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और श्रीराम की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। गीता पाठ, रामचरितमानस का पाठ, विष्णु सहस्रनाम, भजन-कीर्तन, सत्संग और गरीबों की सेवा का विशेष महत्व माना जाता है। 

मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान एवं कथा-प्रवचन आयोजित किए जाते हैं। पुरुषोत्तम अधिक मास का उद्देश्य मनुष्य को आध्यात्मिक मार्ग की ओर प्रेरित करना है। यह मास संयम, सदाचार, सेवा और ईश्वर भक्ति का संदेश देता है। इस दौरान व्यक्ति अपने भीतर की नकारात्मकता, अहंकार और बुराइयों को त्यागकर आत्मचिंतन करता है। 

इस मास में श्रद्धा और सच्चे मन से की गयी आराधना से जीवन के कष्ट दूर होते हैं तथा सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। इस मास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य सामान्यत: नहीं किये जाते हैं। इसके स्थान पर पूजा-पाठ, दान-पुण्य और साधना को अधिक महत्व दिया जाता है। विशेष रूप से अन्न, वस्त्र, जल, गौ सेवा तथा जरूरतमंदों की सहायता को अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।

पुरुषोत्तम अधिक मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और जीवन को सकारात्मक दिशा देने का अवसर भी है। यह मास मानव को धर्म, करुणा, सेवा और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना सिखाता है। श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया गया। पुरुषोत्तम अधिक मास जीवन में आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति और पुण्यफल प्रदान करने वाला माना गया है।

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