- अपने कर्तव्यों का दृढ़ता पूर्वक पालन करना सिखाती है भागवत कथा : श्री गौरव कृष्ण पाठक
एबीएन न्यूज नेटवर्क, भंडरा। भंडरा के ठाकुरबाड़ी मंदिर प्रांगण में आयोजित भगवत प्रतिष्ठा सह श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन भागवत कथा में महाराज जी ने गोवर्धन पूजा और भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया।
गोवर्धन लीला को कहते हुए उन्होंने बताया कि कैसे सात वर्षीय कन्हैया ने सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर धारण किया और इंद्र का अभिमान नष्ट किया। साथ ही इंद्र को अपने कर्तव्य पालन करने की शिक्षा दी और कहा कि अपनी सीमा का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए।
भक्ति का महत्व पर महाराज जी ने जोर दिया कि भगवान केवल प्रेम और निष्काम भक्ति के भूखे हैं। उन्होंने अपनी कथाओं में युवाओं को सनातन संस्कृति से जुड़ने पर भी जोर दिया। महाराज श्री ने गोवर्धन पूजा के माध्यम से प्रकृति संरक्षण का संदेश दिया और बताया कि कैसे भगवान इंद्र के अभिमान को तोड़कर भक्तों की रक्षा करते हैं।
गोवर्धन पूजन का आध्यात्मिक अर्थ अहंकार का त्याग, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और निस्वार्थ भक्ति है। ये कथा सिखाती है कि ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास रखने से विपत्तियां दूर होती हैं। प्रकृति का संरक्षण अनिवार्य है और गो-धन (गाय) की सेवा ही सच्चा धर्म है। यह आत्म-विश्वास और सामूहिक सामुदायिक भावना का प्रतीक है।
श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को कर्म में विश्वास करने और अपनी मेहनत से उपजे अन्न का सम्मान करने के लिए प्रेरित किया न कि केवल इंद्र की पूजा पर निर्भर रहने के लिए। शरणागति का प्रतीक गोवर्धन पर्वत के नीचे आश्रय लेकर व्रजवासियों ने ईश्वर की शरण में जाने का आध्यात्मिक संदेश दिया। भागवत कथा में हजारों महिला पुरुष शामिल हुए।