बाल संस्कारशाला में कलात्मक प्रदर्शन करके वार्षिकोत्सव सोल्लास मनाया
टीम एबीएन, रांची। रांची जिलांतर्गत कांके प्रखंड समन्वय के तहत गायत्री प्रज्ञा केंद्र में अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा आयोजित वार्षिक महोत्सव बाल संस्कारशाला कांके में भव्य रूप से मनाया। संस्कारशाला के बच्चों द्वारा उद्देश्यपूर्ण अभिनय जैसे आॅपरेशन सिंदूर नाटक, नशा मुक्त भारत नाटक, मोबाईल उपयोगी शो जैसी प्रस्तुति की गई।
इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हेजेल डेविस (रोटरी क्लब आॅफ रांची नार्थ सदस्य, संजुक्ता विश्वास काम आलाप संगीत संस्थान की संस्थापक एवं शास्त्रीय संगीत की शिक्षका) और मेरी आवाज, मेरी पहचान के संचालक एवं मुख्य सदस्यगण तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में भी निरंजन सिंह (परिव्राजक गायत्री परिवार, टाटानगर) उपस्थित थे। सभी बच्चों का मनोबल बढ़ाते हुए उन्हें बाल संस्कारशाला कांके की ओर से मेडल तथा पारितोषिक वितरण किया गया।
इसकी संचालिका सुलोचना शाहदेव, सहायक में कृति शाहदेव, सुरुचि रंजन, रेणु श्रीवास्तव सहित टीम सदस्यों ने खूबसूरत ढंग से मनाया। इसके अतिरिक्त इस अवसर पर बहुत से कार्यक्रम हुए, जिसमें संगीत, नृत्य, नाटक, प्रज्ञा योग जैसे कार्यक्रम में बच्चों ने भाग लिया और उनके प्रोत्साहन के लिए उन्हें पुरस्कार और उपहार देकर उनका मनोबल बढ़ाया गया। इस अवसर पर अखंड दीप प्रज्ज्वलित कर गुरुसत्ता, मातृ सत्ता का ध्यान, गायत्री महामंत्र का सस्वर पाठ व वंदना सहित बच्चों में सुसंस्कारिता संवर्धन प्रकरण पर प्रकाश डाला गया। सुलोचना शाहदेव ने बताया कि कुसंस्कारों को हटाकर नये संस्कार स्थापित करना है।
युग परिवर्तन की इस पवित्र बेला में यह अति आवश्यक हो गया है कि हमारी नयी पीढ़ी सुसंस्कारवान बने। बताया गया कि सही संस्कार व परामर्श सही समय पर मिले तो उसका परिणाम श्रेष्ठ निकलता है। इसके लिए यह संजीवनी विद्यायुक्त संस्कार विभूति सबके लिए है। इसका लाभ सबको मिले, यही हमारे बाल संस्कार का लक्ष्य है। समाज में अनगढ़ लोग बहुत रहते हैं और सुयोग्यों की कमी पायी जाती है।
विचार क्रान्ति अभियान अंतर्गत शिशु, बालक, माता-पिता, कुल परिवार, तथा समाज के लिए विडंबना न बने, बल्कि सौभाग्य व गौरव का कारण बने। आज उनके शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक तथा भावनात्मक नव-निर्माण व विकास के लिए शिशुओं में संस्कार प्रकरण व संस्कारवान बनना आवश्यक है। उक्त जानकारी गायत्री परिवार की जिला महिला युवा समन्वयक सुलोचना शाहदेव और जय नारायण प्रसाद ने दी।