- गायत्री महामंत्र भारतीय संस्कृति व संस्कार परम्परा का परम उपास्य मंत्र है : यज्ञ पुरोहित
- 40 दिवसीय गायत्री मंत्र जप-अनुष्ठान पुरश्चक्रण की सामूहिक पूर्णाहुति सोल्लास संपन्न हुई
एबीएन सोशल डेस्क, रांची। अखिल विश्व गायत्री परिवार शान्तिकुञ्ज तत्वावधान व मार्गदर्शन में परम वंदनीया सजल श्रद्धा स्वरूपा गुरुमाता भगवती देवी के पावन जन्म शताब्दी वर्ष सह दिव्य अखंड ज्योति शताब्दी वर्ष क्रम में नियोजित व निर्धारित अनुयाज प्रक्रिया में चलाये गये साधक-शिष्यों के सामूहिक 40 दिवसीय जप- अनुष्ठान पुरश्चक्रण अभियान के अंतर्गत शान्तिकुञ्ज गंगा तटीय क्षेत्र बैरागी दीप में विगत जनवरी वसन्तोत्सव में दिव्य अखंड ज्योति शताब्दी वर्ष सम्मेलन समारोह दौरान लिए गए संकल्प एवं 40 दिवसीय समूह महा पुरश्चक्रण जप-अनुष्ठान अभियान में संकल्पित तथा स्थानीय स्तर पर सामूहिक साधक-शिष्यों के जप-अनुष्ठान की सामूहिक देव दक्षिणा पूर्णाहुति गायत्री महायज्ञ से शक्तिपीठ सेक्टर टू में संपन्न की गई।
इस महत्वपूर्ण पावन अवसर पर यज्ञीय पुरोहित प्रमोद कुमार ने युग निर्माण योजना एवं विचार क्रांति अभियान अंतर्गत बताया कि युग निर्माण व युग परिवर्तन बेला में महापुरश्चक्रण तप साधना अंतर्गत इन दिनों जितना सामूहिक जप-अनुष्ठान कराया जा रहा है, उसमें एकाकी व एकांत उपासना, साधना आराधना संबन्धित जपतपव्रत का अपना महत्व होता है।
बताया कि व्यक्तिगत स्तर पर आत्मिक लक्ष्य प्राप्त करने में एकाकी व एकांत जपतप-अनुष्ठान साधना सही व महत्वपूर्ण है। लेकिन सामूहिक लक्ष्य प्राप्ति में समष्टि का कल्याण, समाज का उत्कर्ष, व्यापक विपदाओं का निवारण करने में आध्यात्मिक प्रयत्नों में सामूहिक प्रयत्न, सामूहिक अनुष्ठान, सामूहिक प्रार्थना महायज्ञ युग संधिकाल में पुरश्चक्रण जैसे प्रयास समाज व विश्व को ध्यान में रखकर ही किए जाते हैं।
जो शान्तिकुञ्ज मार्गदर्शन में अपेक्षित है। विगत 23 जनवरी वसंत पंचमी,15 फरवरी महाशिव रात्रि, 19 मार्च चैत्र नवरात्र से इस तीसरे क्रमिक चरण के अबतक रांची शहर व प्रखंडों की समन्वय समिति से 40 साधक-शिष्य भाई-बहनों ने पुरश्चक्रण जप-अनुष्ठान अभियान में शामिल भारत राष्ट्र, जन कल्याण, विश्व शान्ति व उज्जवल भविष्य के लिए शान्ति व मंगलकामना पाठ किए। आगे उन्होंने बताया कि आगामी 40 दिवसीय जप-अनुष्ठान पुरश्चक्रण में भी और साधक-शिष्य आवेदनपत्र भरने के क्रम में हैं। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के जय नारायण प्रसाद ने दी।