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अपने भीतर संस्कारों के दीप जलाइए, बाहर का अंधकार अपने आप मिट जायेगा : जैन मुनि

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अपने भीतर संस्कारों के दीप जलाइए, बाहर का अंधकार अपने आप मिट जायेगा : जैन मुनि
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एबीएन सोशल डेस्क, रांची। बिरसा मुंडा फन पार्क में चल रहे पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के चौथे दिन शनिवार को तप कल्याणक का आयोजन अत्यंत श्रद्धा के साथ संपन्न हुआ। प्रात: 6 बजे से अभिषेक नित्य पूजन के बाद तप एवं दीक्षा कल्याणक की क्रिया के बाद पुन: 12 बजे तप कल्याणक के अन्तर्गत नाभिराय का दरबार, राज्याभिषेक, षट्कर्म उपदेश, महाराजा आदिकुमार का वैराग्य एवं दीक्षा विधि पूर्ण की गयी। इस दौरान प्रात: 8.30 बजे मुनिश्री का प्रवचन हुआ जिसमें उन्होंने जीवन की सार्थकता, आत्म-जागरण और विचार-शुद्धि पर विस्तृत एवं प्रेरणादायक मार्गदर्शन दिया। 

उन्होंने कहा कि मनुष्य बाहर की परिस्थितियों को बदलने में जितना प्रयास करता है, यदि उतना ही अपने मन, विचार और स्वभाव को बदलने में करे, तो जीवन स्वत: ही शांत, सुव्यवस्थित और सफल बन जाता है। एक जिज्ञासु किसी संत के पास पहुंचा उनके चरणों में निवेदन किया कि मैं गुरुदेव एक माह से लगातार आपको सुन रहा हूं आपकी बातें अच्छी लगती है। आप कहते हैं कि क्रोध बुरा है। लोभ बुरा है। मोह बुरा है। कषाय बुरा है। अच्छा लगता है। 

आप बताते हैं कि पाप हमारा शत्रु है मन को छूता है लेकिन इसके बावजूद न तो मैं पापों से मुक्त हो पाता हूं न हीं कषायो पर नियंत्रण कर पाता हूं आखिर इससे कैसे बचा जाए। उनकी बातें सुनकर संत मुस्कुराए। उन्होंने पूछा तुम कहां से आए हो? उत्तर दिया- मैं श्रावस्ती से आया हूं। तो उन्होंने कहा- श्रावस्ती से कौशांबी कितनी दूरी है? परंतु तुम कैसे आये हो? सिर्फ चर्चा करने से तो नहीं पहुंचे।

तो उसने कहा चल कर आया हूं फिर संत ने कहा कि इस तरह तुम्हें इस मार्ग पर चलना होगा फर्क तो तब पड़ता है जब तुम चलोगे आज तप कल्याणक है आज देखेंगे भगवान राज पाट का परित्याग कर निकलेंगे वन की ओर, उनका दीक्षा कल्याणक है आपकी कोई तैयारी नहीं है जब तक मंजिल की और नहीं पहुंचेंगे चलना तो पड़ेगा आज चलो या कल इस भाव में चलो या अनंत भाव बाद चलना तो पड़ेगा अपने जीवन में त्याग को जीवन का आदर्श बनाकर त्यागियो के अनुगामी बनो।

त्यागियो की अनुगामी बनने का अर्थ उनके पीछे चलना नहीं अपितु उनकी शक्तियों का अनुशरण करना है, चिंतन, मनन, प्रवचन बहुत हुआ अब कुछ करिए आगे बढ़िये। आवरण के सामने ही प्राय नयन नम जाती है और आचरण के सामने आते ही प्राय कदम थम जाती है। धन की रक्षा में प्रवेश करने वाले को सबसे प्रथम कार्य है कुलाचर का पालन, कुलाचर का मतलब हमारे कुल कामागत जो संस्कार है उनका दृढ़ता से अनुपालन। अभक्ष्य का परहेज सात्विक का पालन अपनी खानपान प्रवृत्तियों में दया का पालन यह आपका कूलाचार है जो हमें घुटियों के संस्कार में मिला।

हम भाग्यशाली हैं कि हमारा जन्म ऐसी कुल में हुआ जहां पीढ़ियों से हिंसा और हत्या नहीं हुई। खोज किया जाए तो हमारे डीएनए में अहिंसा है। अपेक्षाओं का बोझ मनुष्य को थका देता है। जितनी कम अपेक्षाएँ, उतनी अधिक शांति। कर्म से पहले विचार आता है। यदि विचार श्रेष्ठ होंगे, तो कर्म अपने आप श्रेष्ठ बन जाएंगे। अहिंसा केवल शारीरिक न हो, वाणी और विचार की अहिंसा उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। 

अपने भीतर दीप जलाइए, बाहर का अंधकार अपने आप मिट जायेगा। मनुष्य के आचरण का पता उसके कुल से लग जाता हैं। कुछ लिखकर सो कुछ पढ़ कर सो जिस जगह जागा सवेरे, उससे बढ़कर सो, एक सीढ़ी बढ़ के सो। मध्याह्न में आदि कुमार की बारात के साथ वैराग्य और दीक्षा विधि संपन्न हुई। संध्या में सांस्कृतिक कार्यक्रम में तप और दीक्षा का चित्रण किया गया। जिस तरह की विधि संस्कार पूजन के माध्यम से पंडाल में हुआ वही प्रक्रिया मंदिर की प्रतिमाओं में भी संपन्न हुई मध्याह्न बेला में मुनिश्री के द्वारा मंदिर जाकर वहां की विधि को भी संपन्न किया गया।

गृह त्याग, वस्त्र त्याग, केश लोचन, आदि सभी प्रक्रिया की गई। राँची के अलावा पूरे भारत के कई स्थानों से लोग इस प्रयोजन हेतू पहुंचे। कल दिनांक 05 अप्रैल को प्रात: 07 बजे से मुनिश्री के सानिध्य में भावना योग के फायदे एवं इसे कैसे अपने जीवन में अपनाकर दैनिक क्रियाओं में शामिल करें इसके लिए मार्गदर्शक किया जाएगा। समाज के मंत्री जीतेन्द्र छाबड़ा एवं अध्यक्ष प्रदीप बाकलीवाल ने सभी धर्म के लोगों से अपील की गई कि आप अधिक से अधिक संख्या में शामिल हों। यह जानकारी मीडिया प्रभारी राकेश काशलीवाल ने दी।

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