स्वामी रामकृष्ण परमहंस जयंती हमें आध्यात्मिक चेतना, नैतिक मूल्यों और मानवता के मार्ग पर चलने की देती है प्रेरणा : संजय सर्राफ
एबीएन सोशल डेस्क। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष संजय सर्राफ ने कहा है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस जयंती हिन्दू पंचांग के अनुसार यह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आती है। इस दिन महान संत, आध्यात्मिक गुरु और समाज सुधारक रामकृष्ण परमहंस के जन्मोत्सव के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी जयंती मनाई जाती है।
देशभर के आश्रमों, विशेषकर रामकृष्ण मठ एवं मिशन द्वारा संचालित संस्थानों में विशेष पूजा, भजन-कीर्तन, प्रवचन और सेवा कार्यों का आयोजन किया जाता है।रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फरवरी 1836 को पश्चिम बंगाल के कामारपुकुर ग्राम में हुआ था। उनका बाल्यकाल का नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था। बचपन से ही वे अत्यंत सरल, करुणामय और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे।
बाद में वे दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पुजारी बने, जहाँ उन्होंने माँ काली की उपासना में गहन साधना की और अद्वैत, भक्ति तथा विभिन्न धर्मों के मार्गों का अनुभव किया। उनका मानना था कि सभी धर्म एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। उन्होंने कहा था-जितने मत, उतने पथ, परंतु लक्ष्य एक ही है।स्वामी रामकृष्ण का जीवन सादगी, प्रेम और ईश्वर-भक्ति का अनुपम उदाहरण है।
उन्होंने समाज को जाति-पांति, संकीर्णता और अंधविश्वास से ऊपर उठकर मानव सेवा का संदेश दिया। उनके प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानंद ने उनके विचारों को विश्वभर में प्रचारित किया और भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित किया, रामकृष्ण परमहंस के विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। वे कहते थे-ईश्वर की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग निष्कपट प्रेम और सेवा है।
उनका संदेश था कि मानव की सेवा ही सच्ची ईश्वर-सेवा है। उन्होंने आत्मशुद्धि, सहिष्णुता और आध्यात्मिक एकता पर विशेष बल दिया।उनकी जयंती हमें आध्यात्मिक चेतना, नैतिक मूल्यों और मानवता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। वर्तमान समय में जब समाज विभाजन और भौतिकवाद की ओर बढ़ रहा है, तब रामकृष्ण परमहंस के विचार प्रेम, सद्भाव और समरसता का प्रकाश स्तंभ बनकर मार्गदर्शन करते हैं। उनकी शिक्षाएँ आने वाली पीढ़ियों को सदैव सत्य, प्रेम और सेवा के पथ पर अग्रसर रहने की प्रेरणा देती रहेंगी।