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इयं तत्वमसि...

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इयं तत्वमसि...
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त्रिवेणी दास

एबीएन सोशल डेस्क। उपनिषद में एक शब्द तत्वमसि का उल्लेख आता है। इस शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। प्रकृति के प्रत्येक अवयव में वही एक तत्व विराजमान है जो तत्व मनुष्य भीतर विराजमान होता है। पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु और आकाश/अंतरिक्ष के प्रकृति (गुण) में वही एक तत्व है। उपनिषद कहता है मनुष्य वही तत्व है। 

एक फल के पौधे के जीवन चक्र के ऊपर विचार करने से पाया जाता है कि जड़, तना और पत्ता उसकी जीवन शक्ति है। समय पर फूल और फल उत्पन्न करता है। फूलों में सुगंध एवं फल के अंदर आवश्यक जीवन-शक्ति के तत्व होते हैं। किसी कारणवश वृक्ष से मूल तत्व बाहर निकला तो वृक्ष मृत होकर सूख जाता है। 

मनुष्य के अंदर का मूल तत्व जैसे ही शरीर का परित्याग करता है तत्क्षण शरीर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। वह तत्व और कुछ नहीं परमात्मा का अंश आत्मा के रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रकृति में रचा-बसा हुआ है और वह सत्य अनंत शक्तिशाली है जो सृजन तथा जीवन चक्र का कारण है। 

जिसने भी उस तत्व को पहचाना तथा उसे संपर्क स्थापित किया उसने अपने कार्यों में अतिरिक्त असाधारण परिणाम उत्पन्न करने में सफलता अर्जित की तथा परम शांति में स्वयं को स्थापित किया।

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