एबीएन सोशल डेस्क।
एक पर्यटक एक होटल में पहुँचा।
पर्यटक ने 2,500 रुपये होटल के काउंटर पर रखते हुए कहा – यह पैसा आप रख लीजिए, मैं पहले कमरा देखकर आता हूँ।
पैसा मिलते ही होटल का मालिक दौड़कर घी वाले की दुकान पर गया और उसे देने वाले 2,500 रुपये चुका कर हिसाब बराबर कर दिया।
घीवाला दौड़कर दूधवाले के पास गया और उसे देने वाले 2,500 रुपये चुका कर हिसाब बराबर कर दिया।
दूधवाला दौड़कर गायवाले के पास गया और उसे देने वाले 2,500 रुपये चुका कर हिसाब बराबर कर दिया।
गायवाला दौड़कर दानावाले (चारा बेचने वाले) के पास गया और हिसाब में से 2,500 रुपये घटा लाया।
अंत में, दानावाला उसी होटल में पहुँचा, जहाँ से वह ज़रूरत पड़ने पर उधार लिया करता था।
उसने होटल मालिक को 2,500 रुपये देकर अपना हिसाब बराबर कर दिया।
तभी पर्यटक कमरा देखकर लौटा और बोला – मुझे कमरा पसंद नहीं आया।
इतना कहकर उसने अपनी जमा की हुई 2,500 रुपये की रकम वापस ले ली और चला गया।
देखिए, इतनी दौड़-धूप में न किसी ने कुछ पाया, न किसी ने कुछ खोया, लेकिन सबका हिसाब बराबर हो गया।
यहाँ कहाँ गड़बड़ी हुई?
कहीं कोई गड़बड़ नहीं हुई। लेकिन यहाँ सबको यह भ्रम था कि रुपये हमारे हैं।
असलियत यह है कि हमें यह समझना ज़रूरी है – हम सब खाली हाथ आए हैं और खाली हाथ ही जाना है।