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मुक्तिदाता स्वयं अपनी हैसियत की तलाश में : डॉ बृज किशोर पाण्डेय

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मुक्तिदाता स्वयं अपनी हैसियत की तलाश में : डॉ बृज किशोर पाण्डेय
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टीम एबीएन, रांची। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में पीएस नरसिम्हा एवं जायमाल्या बागची की पीठ ने शिक्षकों को राष्ट्र की बौद्धिक रीढ़ बताते हुए तल्ख टिप्पणी की  कि -शिक्षक ही समाज के शिल्पकार होते हैं। देश के भविष्य और राष्ट्र निर्माता हैं। भगवान और गुरु दोनों सामने हों तो गुरु का वंदन करना चाहिए, जननी और जनक से ज्यादा सम्मान गुरु को देना चाहिए। ऐसे महिमामंडन करने वाले वचनों, कथनों का कोई अर्थ नहीं है अगर उनको सम्मानजनक वेतन नहीं मिलता है ।यह देश में ज्ञान के महत्व को घटाता है। 

इस टिप्पणी ने तमाम सवालों को जन्म दिया है। शिक्षक का स्तर समाज के सामाजिक -सांस्कृतिक लोकाचार को दशार्ता है। शिक्षा मुक्ति की सांस्कृतिक कार्रवाई है और  जब मुक्तिदाता स्वयं समाज में सम्मान, उचित वेतन और अपनी हैसियत की तलाश में हैं तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी? वर्तमान में शिक्षक के प्रति हमारे नजरिए में बदलाव आया है। 

शिक्षक से आदर्श, चरित्र सादगी की उम्मीद सबको है पर परंपरागत झोलाछाप मास्टर की छवि से इतर शिक्षक का इमेज समाज को गंवारा नहीं है। समाज में आदर्श का पैमाना बदल गया है। आज मिलेनियम, रसूखदार हैसियत वाले हमारे प्रेरणा स्रोत हैं। आखिर शिक्षक के प्रति नजरिया में क्यों बदलाव आया? आज स्कूल शिक्षा का मंदिर कम व्यापार का केंद्र ज्यादा है। अभिभावक ग्राहक, शिक्षा उत्पाद और इस व्यापार में शिक्षक कहां है? सोचिए! 

साइकिल, पोशाक, छात्रवृत्ति मिड डे मील और कितनी योजना है पर वास्तविक शिक्षा कहां है? खिचड़ी की महक से प्रेरित होकर स्कूल में पहुंचने वाले प्रतियोगी परीक्षाओं में कैसे टिकेंगे? निजी विद्यालय में किताब, कापी, ड्रेस की दुकान है और शिक्षा महंगी। कुकुरमुत्ता की तरह ट्यूशन की दुकान, परचून की दुकान की तरह खुले बीएड, डीएलएड या अन्य शिक्षक शिक्षण विद्यालय से देश में भविष्य का कैसा निर्माण होगा? 

जब एजुकेशन एक प्रीपेड सर्विस से ज्यादा कुछ नहीं तो कैसे एक आइडियल सोसायटी के निर्माण की आशा की जा सकती है? आज गुरु शिष्य के संबंध में रिसेशन का दौर क्यों है? अब यह रिश्ता इतना पावन क्यों नहीं रहा? शिक्षक या अध्यापक क्या एक वृति है? यह प्रवृत्ति का रूप धारण क्यों नहीं करती? 
परंतु शिक्षक के चाल चरित्र में आज बदलाव आया है। इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। 

ई लर्निंग, गूगल गुरु, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में भी शिक्षक के महत्व को कम नहीं किया जा सकता है। आज शिक्षक भी सामाजिक बदलाव को स्वीकार कर नए अवतार में हैं। मास्टर साहब आज अपडेट, डिजिटल फिट और हर चुनौती को स्वीकार करने में सक्षम हैं और उचित सम्मान तथा वेतन के हकदार भी हैं।

इसलिए शिक्षक दिवस के दिन हम लोगों को शिक्षा, शिक्षक- छात्र संबंध, शिक्षक का सम्मान, वेतन, सरकारी एवं प्राइवेट स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के प्रति सकारात्मक सोच रखते हुए सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक बदलाव की नींव रखने की जरूरत है ताकि देश के भविष्य जिनके हाथ में है वो हाथ मजबूत हो। शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं...।

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