त्रिवेणी दास
एबीएन सोशल डेस्क। आचार्य चाणक्य ब्राह्मण जाति के थे। उनके पिता का नाम चणक था इसीलिए चाणक्य कहलाए। उनका वास्तविक नाम विष्णुगुप्त था। देश कल्याण और जन कल्याण की प्राप्ति के लिए कूटनीति का प्रयोग अथवा कुटिलता के कारण उन्हें "कौटिल्य" कहा गया। चाणक्य के आदर्श महाभारत के अर्जुन के सारथी भगवान श्रीकृष्ण थे।
तक्षशिला विश्वविद्यालय से उन्होंने शिक्षा ग्रहण की बाद में वहीं पर अध्यापक नियुक्त हुए। सिकंदर के भारत प्रवेश पर वह चिंतित हुए और तत्कालीन भारतीय राजनीति में उन्हें आगे आना पड़ा। अपने कुटिल प्रयास से उन्होंने चंद्रगुप्त को मगध का सम्राट बनाया और भारतीय सीमाओं को सुरक्षित किया।
अर्थशास्त्र उनका प्रिय विषय था। लेकिन जब राष्ट्र के ऊपर आने वाले संकट का उन्हें अनुमान हुआ तो उन्होंने राजनीति का कठिन और वक्र मार्ग का चुनाव किया और सत्ता परिवर्तन के सूत्रधार बने।
राजा, राजमहल और राजदरबार के प्रतिदिन के उठा-पटक से वह स्वयं को यथासंभव दूर ही रखते थे। राज्य कार्यों से बचे समय वे किताबों की रचना किया करते थे। उनकी प्रमुख रचना चाणक्य नीति दर्पणम तथा अर्थशास्त्र के रूप में आज भी एक बहुमूल्य धरोहर है।
चाणक्य विद्वान, ज्ञानी और दूरदर्शी थे इसीलिए उन्होंने राजगद्दी से स्वयं को दूर ही रखा लेकिन राज सत्ता पर आवश्यक नियंत्रण बनाए रखा; जबकि नंद वंश के अंतिम राजा धनानंद के पतन के बाद उसके महामंत्री (अमात्य) राक्षस को चंद्रगुप्त के प्रति निष्ठावान बनाकर राजकाज का संचालन करवाया क्योंकि अमात्य राक्षस का देश के प्रति निष्ठा असंदिग्ध थी।
एक शिक्षक और विद्वान शांति की जीवन जीने वाला को भी राष्ट्रीयसंकट के समय देश भक्ति का संकल्प लेकर समाज-हित में कठिन मार्ग में चलने का पुरुषार्थ करना पड़ता है; आचार्य चाणक्य की जीवनी यही प्रेरणा देती है।