चाहे समय महाभारत का हो, मध्यकाल का हो या आज का। राखी का धागा सिर्फ कलाई में नहीं, बल्कि विश्वास और प्रेम में बंधा होता है : योगाचार्य महेश पाल
एबीएन सोशल डेस्क। रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है, योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि रक्षा बंधन सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस रक्षाबंधन भाई-बहनों के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाई की लंबी उम्र, तरक्की और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए उसे राखी बांधती हैं, और बदले में भाई जीवन भर उनकी रक्षा का वचन देता है। रक्षा का मतलब सुरक्षा और बंधन का मतलब बाध्य है।
रक्षाबंधन के दिन बहने भगवान से अपने भाईयों की तरक्की के लिए भगवान से प्रार्थना करती है।राजसूय यज्ञ के समय श्रीकृष्ण को द्रौपदी ने भी रक्षासूत्र रूप में अपने आंचल का टुकड़ा बांधा था। इसी के बाद से बहनों द्वारा भाई को राखी बांधने की परंपरा शुरू हो गयी, रक्षाबंधन पर भाई-बहन के रिश्तों के कुछ उदाहरण जैसे सुरक्षा का वचन, प्यार और स्नेह, विश्वास, खुशी और उत्सव, पारिवारिक बंधन, जब एक बार भगवान श्रीकृष्ण की उंगली से खून बहते देख द्रौपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया।
श्रीकृष्ण ने बदले में उन्हें यह वचन दिया कि वे हर संकट में उनकी रक्षा करेंगे। दुर्योधन द्वारा द्रोपदी के चीर हरण के समय भगवान श्री कृष्णा अपने भाई होने का कर्तव्य निभाया और उसे चीर हरण के समय द्रौपदी की सुरक्षा की यही रक्षा का भाव रक्षाबंधन का मूल है। संत कबीर की बहन ने उन्हें राखी बांधते हुए रक्षा का आग्रह किया।कबीर ने कहा कि वे हमेशा उन्हें न केवल शारीरिक खतरों से, बल्कि आध्यात्मिक अज्ञान से भी बचायेंगे।
यह कथा बताती है कि रक्षा केवल तलवार से नहीं, बल्कि मार्गदर्शन और अच्छे जीवन के मूल्यों से भी होती है। राजस्थान के जयपुर में रहने वाली 24 वर्षीय पूजा को एक सड़क दुर्घटना में काफी खून बह गया। डॉक्टरों ने तुरंत ड-नेगेटिव ब्लड की जरूरत बताई, जो दुर्लभ है। अस्पताल पहुँचे से पहले ही उसका भाई रोहित, जिसने कुछ महीने पहले ही ब्लड डोनेशन के लिए अपना नाम रजिस्टर कराया था, दौड़कर पहुँचा और बहन की जान बचाने के लिए रक्तदान किया। दिल्ली की सीमा को अचानक किडनी फेल होने की समस्या हुई।
डायलिसिस पर जीवन कट रहा था। टेस्ट में पाया गया कि उसके भाई अनिल का मैच पूरी तरह सही है। बिना एक पल सोचे अनिल ने अपनी किडनी बहन को डोनेट कर दी। आज सीमा पूरी तरह स्वस्थ है और कहती हैं, मेरे भाई ने मुझे दूसरी बार जन्म दिया। रक्षाबंधन की परंपरा का मूल भाव बहन का रक्षा-सूत्र बांधना और भाई का रक्षा-वचन निभाना अब भी वही है, लेकिन समय और समाज के बदलाव के साथ इस त्योहार की कई नई रूपरेखाएं उभर आयी हैं।
रिश्तों की परिभाषा में विस्तार:-
- पहले राखी मुख्यत: जन्म से भाई-बहन के बीच बांधी जाती थी।
- अब बहनें मित्रों, सहकर्मियों, गुरुओं, यहां तक कि पुलिसकर्मियों और सैनिकों को भी राखी बांधकर सुरक्षा के भाव को व्यापक रूप दे रही हैं।
- कई बार महिलाएं एक-दूसरे को भी सुरक्षा और समर्थन के प्रतीक के रूप में राखी बांधती हैं।
उपहार के रूप में बदलाव
पहले भाई बहनों को मिठाई, कपड़े या थोड़े पैसे देते थे। अब गिफ्ट कार्ड, आनलाइन शॉपिंग वाउचर, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट, इंश्योरेंस पॉलिसी, और यहां तक कि म्युचुअल फंड एसआइपी जैसी निवेश योजनाएं भी उपहार में दी जा रही हैं।
दूरी के कारण डिजिटल रक्षाबंधन प्रवासी और दूर रहने वाले भाई-बहन अब वीडियो कॉल, ई-राखी, और आॅनलाइन गिफ्ट डिलीवरी के जरिए त्योहार मनाते हैं। कई ऐप और वेबसाइट पर वर्चुअल राखी भेजने की सुविधा है।
सामाजिक और सरकारी पहल
कई राज्यों में रक्षाबंधन के दिन महिलाओं के लिए मुफ्त बस या ट्रेन यात्रा की सुविधा दी जाती है (जैसे यूपी, राजस्थान, मध्य प्रदेश)। स्कूलों, कॉलेजों और एनजीओ में रक्षाबंधन को पर्यावरण या सामाजिक संदेशों के साथ जोड़ा जाता है—जैसे पेड़ों को राखी बांधकर प्रकृति की रक्षा का संकल्प लेना।
रक्षा की अवधारणा का आधुनिकीकरण
अब रक्षा का मतलब केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं रहा। भाई बहनों को साइबर सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा और भावनात्मक समर्थन भी देने लगे हैं।
बहनें भी भाइयों को राखी बांधकर उन्हें स्वास्थ्य और मानसिक सुख-शांति की शुभकामनाएं देती हैं। रक्षाबंधन का सार यह है कि रक्षा केवल शारीरिक खतरे से नहीं, बल्कि जीवन के हर भय, चिंता और असुरक्षा से होती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि वचन निभाना ही सच्चे रिश्ते की पहचान है—चाहे समय महाभारत का हो, मध्यकाल का हो या आज का।
राखी का धागा सिर्फ कलाई में नहीं, बल्कि विश्वास और प्रेम में बंधा होता है। रक्षाबंधन समय के साथ अपने रूप और तरीकों में भले बदल गया हो, लेकिन इसकी आत्मा आज भी वैसी ही है—रिश्तों में प्रेम, विश्वास और सुरक्षा का वचन। यह धागा अब सिर्फ भाई-बहन के बीच ही नहीं, बल्कि समाज और इंसानियत के बीच भी जुड़ाव का माध्यम बन चुका है।