ब्रह्माकुमारी निर्मला
टीम एबीएन, रांची। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की प्रथम अध्यक्षा जगदम्बा माँ की पुण्य तिथि के अवसर पर ब्रह्मकुमारी संस्थान में पूरे दिन भर राजयोग अभ्यास किया गया। उन्होंने अपने दिव्य व्यक्तित्व के सुचीकृत आकर्षण से हजारों नारियों को स्वयं परमपिता परमात्मा द्वारा इस सृष्टि के परिवर्तन के महान कार्य के लिए निमित्त बनाया जो नव-सृजन की राह दिखाई। वह वर्तमान में भी नारी सत्ता द्वारा संचालित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के रूप में समस्त संसार को आलोकित कर रहा है।
इस अवसर पर राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी निर्मला ने कहा उनकी वाणी जलतरंग की तरह अमृत बरसाती हुई सत्यता और निर्मलता से भरी होती थीं। नव सृष्टि के निर्माण हेतु संकल्पित ब्रह्म ज्ञान देवी सरस्वती, दुर्गुणों को मिटाने वाली दुर्गा, धन-सम्पदा से भरपूर करने वाली लक्ष्मी, विकारों को जाने वाली कालिका खप्पड़वाली जैसे अनेक गुणों की प्रतिमान बना दी।
उनके चमकारिक आध्यात्मिक व्यक्तित्व ने तो हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई जैसे वर्ग संघर्ष में उलझे लोगों को इक्कीसवीं सदी के सत्पुरुषों योग्य बना दिया। सदा आलोकितता पर बैठे रहने के कारण कि सीत और लोक को आई हुई परी सी जान पड़ती मातेश्वरी जी ममतामयी की मूरत। गहन आध्यात्मिकता प्रेरणाओं से अति-प्रोत श्वेतवस्त्र धारणी सरस्वती मैय्या को ब्रह्म की एक पसली से निर्मित हुआ माना जाता है।
वैसे भी आदि देव ब्रह्मा की गोद ली हुई, दिल के पास रहने वाली अतिप्रेम संताने थीं। वे ऊंच-नीच के भेद-भाव रखे बिना, लौकिक माँ-बाप से हजारों गुणा निस्वार्थ प्रेम और शुभेच्छा लुटाती करती थीं। माया के जंजीरों से मुक्त नहीं कराती थीं ईश्वरीय जन्मसिद्ध अधिकार दिलाने हेतु प्रयत्नशील रहती थीं। बहुत कोशिशों के बाद भी कोई आध्यात्मिक जागृति पा जाये तो उन्हें आंतरिक खुशी होती थी।
हृदय भावनायें मिटाकर सम्पूर्ण आत्मविश्वास जगाने की उनमें अद्भुत युक्ति और शक्ति राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने अपने संदेश में कहा कि ब्रह्म की मानस पुत्री श्री मातेश्वरी जगदम्बा जी के जीवन में योग और कर्म का संतुलन का अद्भुत समन्वय था। गीता के अनुसार राजयोग साधना की यह परमोच्च स्थिति को स्पर्श कर लेती है तो योग: कर्मकुशलता की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। ऐसे साधक की किसी भी क्षण अपने संकल्प को शक्ति में परिवर्तित करने की क्षमता विकसित हो जाती है।
मातेश्वरी जी ने स्वयं परमपिता परमात्मा शिव द्वारा सिखाये गये राजयोग से कर्म योग द्वारा जीवन मुक्ति प्राप्त करके कर्मोंग पर विजय प्राप्त कर लिया था। मातेश्वरी जी अभय वरदान प्राप्त करके कैंसर जैसी असाध्य और असह शारीरिक बीमारी के भय को परास्त करते हुए अंतिम स्वांस तक मानवता की सेवा में तत्पर रहीं। मातेश्वरी जी अपने नश्वर भौतिक शरीर का परित्याग करने के कुछ क्षण पूर्व तक ईश्वरीय ज्ञानामृत की पावन ज्ञान-गंगा बनकर उपस्थित मनुष्यात्माओं को पवित्र बनाने के पुण्य कर्म में सलग्न रहीं।
24 जून 1965 को मातेश्वरी जी ने स्वयं को शारीरिक कर्मेंद्रियों सीमाओं और बंधनों से मुक्त कर सम्पूर्णता को प्राप्त कर महाप्राण यात्रा पर प्रस्थान किया। मातेश्वरी श्री जगदम्बा की सूक्ष्म उपस्थिति आज भी ब्रह्मावासियों को जीवन-पंथ पर अचल-अडोल होकर कर्म योग के लिए प्रेरणा प्रदान कर रही है। मातेश्वरी श्री जगदम्बा जी के दिखाये कर्म-साधना के पथ पर चलते हुए राजयोग की साधना द्वारा रुद्र-यज्ञ, आहुतियाँ और निराहकारी बनकर मानवता की सेवा में समर्पित रहे, यही हम ब्रह्मावासियों की उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि।
इस अवसर पर मातेश्वरी जी के जीवन चरित्र पर आधारित नाटिका का बालिकाओं द्वारा मंचन किया गया साथ ही गाईडेड मेडिटेशन का भी अभ्यास कराया गया। सभा में उपस्थित सभी ब्रह्म वत्सों ने पुष्पाजंली अर्पित किया तथा भोग स्वीकार किया। नया युग आध्यात्मिक युग होगा। पवित्रता ही सुख शान्ति की जननी है हर कीमत पर इसकी रक्षा करना अपना सर्वप्रथम कर्तव्य है। (लेखिका ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की केन्द्र प्रशासिका हैं।