कबीर दास ने समाज में व्याप्त आडंबरों, पाखंडों और भेदभाव का किया था खंडन : संजय सर्राफ
टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय संत और कवि संत गुरु कबीर दास की जयंती इस वर्ष बुधवार 11 जून को मनायी जायेगी। यह दिन हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को पड़ता है। संत कबीर दास का जन्म 1398 में वाराणसी (काशी) में हुआ था।
उनके माता-पिता मुस्लिम थे, लेकिन कबीर ने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की सीमाओं को पार करते हुए एकता और मानवता का संदेश दिया। उनकी रचनाएं बीजक, साखी ग्रंथ, कबीर ग्रंथावली और अनुराग सागर के रूप में प्रसिद्ध हैं। संत कबीर की जयंती उनके योगदान और शिक्षाओं को सम्मानित करने का अवसर है। उनकी शिक्षाएं आज भी समाज में प्रासंगिक हैं, जो हमें धर्म, जाति और संप्रदाय से परे मानवता, प्रेम और एकता का संदेश देती हैं।
उनकी कविताएं और दोहे आज भी लोगों के जीवन में मार्गदर्शन का कार्य करते हैं। संत कबीरदास जी 15वीं सदी के एक महान कवि, समाज सुधारक और संत थे। उन्होंने अपने दोहों और पदों के माध्यम से समाज में व्याप्त आडंबरों, पाखंडों और भेदभाव का खंडन किया. उन्होंने एकता, प्रेम, समानता और भाईचारे का संदेश दिया कबीर दास जी ने मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा और कर्मकांडों का विरोध किया और सीधे ईश्वर के प्रति समर्पण पर जोर दिया।
उनका मानना था कि ईश्वर एक है और उसे किसी भी रूप में पूजा जा सकता है। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं और हमें एक बेहतर समाज बनाने के लिए प्रेरित करते हैं। संत कबीरदास जयंती का पर्व कबीरदास जी के विचारों और शिक्षाओं को याद करने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का एक अवसर है। इस दिन देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें भजन, कीर्तन, प्रवचन और सत्संग शामिल हैं।
लोग कबीरदास जी के दोहों का पाठ करते हैं और उनके बताये मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि सच्चा धर्म प्रेम, करुणा और मानवता की सेवा में निहित है। हमें सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए और एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए जहां कोई भेदभाव न हो।
संत गुरु कबीर जयंती न केवल एक धार्मिक पर्व है, बल्कि यह हमें अपने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, भेदभाव और असमानता के खिलाफ जागरूकता फैलाने का अवसर भी प्रदान करती है। इस दिन को मनाकर हम संत कबीर की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें और समाज में एकता और भाईचारे की भावना को बढ़ावा दें।