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सीता नवमी : माता सीता का प्राकट्य दिवस

सीता नवमी : माता सीता का प्राकट्य दिवस
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सीता नवमी धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण पर्व : संजय सर्राफ 

एबीएन सोशल डेस्क। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि सीता नवमी जिसे जानकी नवमी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है जो वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन को देवी सीता के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। साल वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को सीता नवमी मनायी जाती है। 

इस दिन को सीता जयंती और जानकी जयंती के नाम से भी जाना जाता है। बता दें कि मां सीता मिथिला नरेश राजा जनक की पुत्री थीं, इसलिए उन्हें जानकी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वैशाख शुक्ल की नवमी तिथि के दिन माता सीता धरती पर प्रकट हुई थीं। सीता नवमी का शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि का आरंभ 5 मई को सुबह 7 बजकर 35 मिनट पर होगा। 

नवमी तिथि का समापन 6 मई को सुबह 8 बजकर 38 मिनट पर होगा। सीता नवमी के दिन व्रत करने का भी विधान है। इस दिन व्रत कर भगवान राम और मां सीता की विधिपूर्वक की जाती है। कहते हैं कि सीता नवमी के दिन जो कोई भी व्रत करता है, उसे सोलह महादानों और सभी तीर्थों के दर्शन का फल मिलता है। 

साथ ही माता सीता और श्री राम के मंत्र का 11 बार जप करना चाहिए। मंत्र इस प्रकार है- श्री सीतायै नम:। श्री रामाय नम: इस प्रकार मंत्र जप करके माता सीता और श्री राम,दोनों को पुष्पांजलि चढ़ाकर उनका आशीर्वाद लें। इससे आपके सारे मनोरथ सिद्ध होंगे और आपकी सारी इच्छाएं पूरी होंगे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा जनक संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे। 

यज्ञ भूमि की जोताई करते समय हल से एक कन्या प्रकट हुई, जिसे राजा जनक ने अपनी पुत्री के रूप में अपनाया और उसका नाम सीता रखा। सीता शब्द का अर्थ है जोती हुई भूमि, जो इस घटना से जुड़ा है। सीता नवमी का पर्व विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है। इस दिन व्रत रखने से दांपत्य जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। माता सीता को आदर्श पत्नी और नारीत्व की प्रतीक माना जाता है।

सीता नवमी के दिन प्रात:काल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। फिर पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें और भगवान राम तथा माता सीता की मूर्तियों का पूजन करें। पूजा में रोली, चावल, पुष्प, फल, मिठाई, दीपक आदि अर्पित करें। रामायण का पाठ करें और माता सीता की आरती उतारें।इस दिन विशेष रूप से 16 श्रंगार की वस्तुएं जैसे सिंदूर, बिंदी, चूड़ी आदि माता सीता को अर्पित करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। 

इसके अलावा, खीर का भोग लगाकर सात कन्याओं को प्रसाद देने से धन-संपत्ति में वृद्धि होती है। दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और पापों का नाश होता है। सीता नवमी न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण पर्व है। 

यह पर्व हमें माता सीता के आदर्शों का पालन करने की प्रेरणा देता है और हमारे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करता है। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि सीता नवमी के अवसर पर 6 मई को पुंदाग स्थित श्री राधा कृष्ण मंदिर में विशेष पूजा- अर्चना, भोग एवं भजन- कीर्तन का आयोजन किया गया है।

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