माताएं संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य के लिए करती है निर्जला व्रत : संजय सर्राफ
टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता सह रांची जिला मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री संजय सर्राफ ने कहा है कि सनातन धर्म मे अहोई अष्टमी पर्व का बहुत अधिक महत्व है। अहोई अष्टमी पर्व भारतवर्ष मे करवा चौथ के बाद एवं दीपावली से 8 दिन पहले कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष 24 अक्टूबर दिन बृहस्पतिवार को अहोई अष्टमी का उपवास रखा जायेगा।
अहोई अष्टमी तिथि की शुरुआत 23 अक्टूबर को रात 1 बजकर 18 मिनट पर होगी तथा 24 अक्टूबर को रात 1 बजकर 58 मिनट पर समाप्त होगी। इस तिथि के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत 24 अक्टूबर को होगा। अहोई अष्टमी को अहोई आठे भी कहते हैं। इस दिन महिलाएं संतान की दीर्घायु सुख- समृद्धि एवं अच्छे स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, जिसका पारण रात को तारों को अर्घ्य देने के बाद किया जाता है।
शास्त्रों के अनुसार अहोई अष्टमी के दिन माता पार्वती के अहोई स्वरूप की पूजा की जाती है। जिससे देवी प्रसन्न होती है और संतान की खुशहाल जीवन की आशीर्वाद देती है। इस साल अहोई अष्टमी पर साध्य योग और पुष्प नक्षत्र का निर्माण हो रहा है। इस योग में कुछ उपाय करने से संतान के जीवन में खुशियों का वास बना रहता है साथ ही सभी समस्याएं भी दूर होती है।
इस दिन माताएं अपने बच्चों की सलामती के लिए निर्जला उपवास कर अहोई अष्टमी की पूजा करती है। अहोई की पूजा में दीवार पर आठ कोष्टक वाली अहोई माता की तस्वीर बनाई जाती है उनके पास साही और उसके बच्चों की तस्वीर बनाई जाती है। इसके बाद महिलाएं कलश में जल भरकर और हाथ में चावल लेकर अहोई मां की कथा सुनती है। उन्हें दूध और चावल का भोग लगाया जाता है।