एबीएन सोशल डेस्क। अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुञ्ज के तत्वावधान में राष्ट्र स्तरीय संचालित आनलाइन स्वाध्याय महिला मंडल, प्रज्ञामंडल के सानिध्य में पूज्यवर श्रीगुरुदेव वेदमूर्ति- तपोनिष्ठ पण्डित श्रीरामशर्मा आचार्य जी की लिखित वांग्मय गायत्री महाविद्या के तत्वदर्शन पर आनलाइन स्वाध्याय पाठ व संवाद चल रहा है।
इसमें आज इसके तत्वदर्शन पर प्रकाश डालकर बताया गया कि ब्रह्मवेत्ता, योगी, अध्यात्मवादी, तत्वदर्शी भक्त वर्ग गायत्री की आद्यशक्ति के एक-एक चरण के उपासक होते हैं। गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। उसके तीन चरण हैं। इस त्रिवेणी शक्ति की अधिष्ठात्री को त्रिपदा गायत्री कही गई है। संसार के समस्त दु:खों के प्रधान कारण हैं- अज्ञान, अभाव, अशक्ति और इससे सत, रज, तम की विविधि प्रकृति से मनुष्य का निर्माण हुआ है।
वस्तुत: सत्ता दो की है। सत और तम की। रज की उत्पत्ति तो दोनों के सम्मिश्रण से होती है। चर्चा हुई कि दु:खों के कारणों में भी प्रधान दो ही हैं- अज्ञान और अशक्ति। अभाव तो उनकी परिणति है। गायत्री की तीन शक्ति धाराएं हैं- हीं, श्रीं और क्लीं। ह्रीं सद्ज्ञान की, श्रीं वैभव की और क्लीं शक्ति की, बल की प्रतीक हैं। सत्-रज-तम से बनी काया को आवश्यकता तीनों ही शक्ति धाराओं की है। इनमें किसी का भी महत्व कम नहीं है।
तीनों का संतुलन आवश्यक है। जीवन निर्वाह के लिए जितना महत्व ज्ञान का है, उतना ही साधनों एवं शक्ति का। एक भी पक्ष छोड़ा नहीं जा सकता।बताया गया कि गायत्री महामन्त्र में तीनों शक्ति धाराओं का समान रूप में समावेश है। साधनों के संग्रह की आपाधापी में विश्व मानस ने चेतना की महत्ता को लगभग भुला दिया है।
बताया गया कि आज जरूरत है, उसके लिए आत्मा के अन्दर प्रकाश उत्पन होना चाहिए, जिससे सत्य और असत्य का विवेक जागे। सारांश में दीदी ने बताया कि कुमार्ग को छोड़कर श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले, गायत्री मन्त्र में यही भावना विद्यमान है। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने दी।