एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग व राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ श्रावण माह की महत्ता को बताते हुए कहा कि देवताओं एवं दानवों के द्वारा समुद्र मंथन से 14 रत्न प्राप्त हुए थे, जिनमें विष भी एक रत्न था। संसार को विष के ताप से बचने के लिए भगवान शंकर ने उसे अपने कंठ में धारण किया, तब से उनके माथे पर (शिवलिंग) जलाभिषेक किया जाने लगा जिससे उन्हें शीतलता प्राप्त होती है।
भगवान शंकर के अभिषेक में जल, घी, दूध, दही और चंदन इत्यादि शीतलता प्रदान करने वाली वस्तुएं प्रयोग में लायी जाती है। चंद्रमा उनके माथा पर सदैव विराजमान होकर उन्हें शीतलता प्रदान करती है। मनुष्य के जीवन में विपरीत परिस्थिति, चिंता एवं तनाव और हतोत्साह का जलन आता ही रहता है।
हमारे जीवन के ताप को भी शीतलता की आवश्यकता होती है। अध्यात्म विज्ञान की शुरुआत शरीर, मस्तिष्क, मन और भावना की शीतलता से होती है। शीतलता ही पवित्रता का ही पर्याय है। शीतलता सद्ध जाने के बाद ज्ञान का उदय होता है और ज्ञान के बल पर भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए भगवान शंकर का वरदान रूपी सफलता प्राप्त होती है।