टीम एबीएन, रांची। गोस्सनर महाविद्यालय के आइक्यूएसी और दर्शनशास्त्र विभाग के संयुक्त तत्वावधान में गीता जयंती पर संगोष्ठी आयोजित की गयी। संगोष्ठी का विषय था : भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति के निर्माण में गीता की भूमिका। कार्यक्रम में आगत अतिथियों का स्वागत व विषय- प्रवेश दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ प्रदीप गुप्ता ने किया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि/ मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे इस्कॉन रांची के जनरल मैनेजर मधुसूदन मुकुंद दास प्रभुजी (बीटेक, कंप्यूटर विज्ञान, एमबीए, आईआईटी कानपुर)। अपने उद्बोधन में मधुसूदन दास प्रभु ने कहा कि भगवतगीता विश्वभर में भारत के आध्यात्मिक ज्ञान के मणि के रूप में ख्यात है। इसका संदेश भगवान कृष्ण और अर्जुन तक ही सीमित न होकर संपूर्ण मानवता के लिए है।
आगे उन्होंने कहा कि भारत में प्रति तीन सेकेंड में एक लोग आत्महत्या की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं, वहीं प्रत्येक वर्ष आठ लाख लोग आत्महत्या कर रहे हैं। इसका मूलकारण चिंता, तनाव और डिप्रेशन है। भौतिकतावादी की अंधी दौड़ में पूरा विश्व शामिल है। हम सभी शरीर की तल में जीते हैं और वहीं मर जाते हैं। अपने मूल आत्मस्वरूप का विस्मरण सभी दु:ख का कारण है। गीता अवसाद से आनंद की यात्रा है।
कार्यक्रम में हिंदी विभाग के सहायक प्रो डॉ हाराधन कोईरी ने कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा की पराकाष्ठा है गीता। इसमें किसी मत का आग्रह न होकर संपूर्ण जीव के कल्याण का आग्रह है। कार्यक्रम का संचालन हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ प्रशांत गौरव ने की वहीं आभार ज्ञापन दर्शन शास्त्र विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ विनोद राम ने किया।
मौके पर विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया गया, जिसमें गीता प्रश्नोत्तरी, निबंध, भाषण आदि शामिल है। विजेता विद्यार्थियों को यथार्थ गीता की प्रति देकर सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम में कला संकायाध्यक्ष डॉ जयपाल कच्छप, डॉ ज्योति टोप्पो, डॉ एस के सेन गुप्ता, डॉ सुब्रतो सिन्हा, डॉ ध्रुपद चौधरी, डॉ अनीता रंजन, डॉ मीना सुरीन, डॉ नीलम तिरु, डॉ अब्दुल बासित, डॉ सुप्रीति जाना सहित विभिन्न संकायों के विद्यार्थी मौजूद थे।