एबीएन सोशल डेस्क। इस्लामिक किताबों में हलाल मांस की चर्चा की गयी है। हलाल मांस वो है जो उनके अनुसार कुछ प्रतिबंधित जानवरों का नहीं है और जिसे कलमा पढ़ पढ़ कर धीरे काटा गया है। पर धीरे-धीरे मौलवियों ने कहीं शाकाहारी पदार्थों को भी हलाल की श्रेणी में लाना शुरू कर दिया।
जैसे- नमकीन, पानी, बिस्कुट, लिपस्टिक, चायपति, आदि आदि। इसमें कई पदार्थ तो मोहम्मद के समय थे भी नहीं। हलाल सर्टिफिकेट के नाम पर कई इस्लामिक संस्थाओं ने धंधा शुरू कर दिया कि जिन पदार्थों को वो पैसा लेकर हलाल घोषित करेंगे और हलाल सर्टिफिकेट देंगे, उसे ही मुसलमान प्रयोग करेंगे।
चूंकि इस्लाम में हर चीज की पाबंदी ही पाबंदी है और मुसलमान को अरबी में लिखें किताबों का कोई ज्ञान नहीं है, तो उनको लगा ये संस्थाएं सही कह रही हैं और हर वस्तु का हलाल होना आवश्यक है। ये संस्थाएं, जो हलाल सर्टिफिकेट दे रही है, वो यह प्रमाणित करती हैं कि मौलवी ने हर उत्पादन के बाद उस पदार्थ पर विक्रय के पूर्व फूंक (यानी थूक) के साथ कलमा पढ़ा है।
कंपनी यह सोच कर मौलवी नियुक्त कर थुकवा कर हलाल सर्टिफिकेट लेती हैं कि मुसलमान उनका बॉयकॉट न करे। अगर मौलवी नियुक्त न किया गया हो तो पैसा खिला कर हलाल सर्टिफिकेट ले लिया जाये। इस तरह हलाल सर्टिफिकेट देनी वाली इस्लामिक संस्थाओं के लिए ये कमाई का एक जरिया बन गया।
इस पैसे को वो आतंकवाद के लिए भी प्रयोग करवाती हैं। चूंकि हिंदू को फर्क नहीं पड़ता कि पदार्थ हलाल है या नहीं, वो हलाल की हुई चीजों का प्रयोग करता रहता है। पर बाद में कुछ हिंदुओं ने, विशेष कर सिखों ने, इस बात का विरोध किया कि उन्हें हर चीज मौलवी की झूठी की हुई ही क्यों खाना चाहिए?
उन्होंने हलाल सर्टिफिकेट वाले पदार्थों का विरोध शुरू किया। पर मुसलमानो में एकता के कारण विरोध का असर न था और बीकाजी जैसी शुद्ध शाकाहारी कंपनी भी अपने नमकीन के लिए हलाला सर्टफिकेट ले रही है। पर अब जागने का समय है।
अगर हम इस मानसिक गुलामी से स्वतंत्रता चाहते है तो आज से ही तथाकथित हलाल पदार्थों का बॉयकॉट करें। हलाल पूरे भारत को इस्लामीकरण करने की ओर एक बड़ा कदम है। अपने सिख और जैन भाइयों से सीखें और अपने संकृति को बचायें।