फूल गिरते ही मनोकामना पूर्ति का संकेत देती हैं मां
एबीएन न्यूज नेटवर्क, लातेहार। चंदवा प्रखंड के नगर ग्राम स्थित प्रसिद्ध मां उग्रतारा नगर भगवती मंदिर में 16 दिवसीय शारदीय दशहरा पूजा की अनूठी परंपरा सदियों से चली आ रही है। मंदिर की खास बात यह है कि यहां पर 16 दिवसीय शारदीय पूजा आयोजित होती। मां की पूजा भक्तोें की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। महाविद्या के इस मंदिर में फूलों के आश्चर्यजनक ढंग से गिरने तथा मनोकामना पूर्ति के बीच अटूट संबंध किसी नास्तिक के हृदय में भी आस्तिकता की भावना जागृत करने में सक्षम है।
फूल गिरना कामना पूर्ण होने का संकेत
मंदिर के सेवायत मुंतजिमकार पंडित गोविंद बल्लभ मिश्र ने बताया कि प्रकृति की गोद में अवस्थित नगर का मां उग्रतारा देवी मंदिर अपने अपने महात्म्य के कारण पूरे श्रद्धा का केंद्र है। देवी की महिमा से अभिभूत सभी संप्रदायों के लोग अपनी मनोकामना तथा मनौती के लिए यहां आते हैं।
इस जाग्रत सिद्ध स्थल में देवी की महिमा स्पष्ट परिलक्षित होती है। मनोकामना के पूर्णता या अपूर्णता की जानकारी हेतु देवी की गद्दी पर प्रत्येक कामना के लिए ग्यारह फूल रखे जाने का विधान है, फूलों का स्वयंमेव गद्दी से नीचे गिरना कामना पूर्ण होने का संकेत समझा जाता है।
मंदिर की प्राचीनता एवं इतिहास
वैसे तो मंदिर का कोई लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है, पर मंदिर के पूजा प्रयुक्त हस्त लिखित पुस्तक मंदिर की प्राचीनता सिद्ध करती है। शारदीय नवरात्र पूजा पद्धति जो दूसरी बार लिखी गयी है, में विक्रम संवत सन 1607 ई) अंकित है, स्पष्ट है कि इससे पूर्व की पुस्तक भी काफी प्राचीन रही होगी।
खास है पूजा पद्धति है खास
इस मंदिर में बाहरी पकवान या लड्डू का भोग सर्वथा वर्जित है। मंदिर कार्य में नियुक्त व्यक्ति द्वारा ही निर्मित पकवान भोग चढ़ाये जाते हैं। देवी के प्रसाद के स्वरूप मिश्री, गुड़, एवं फल अर्पित किये जा सकते हैं। मंदिर में दैनिक पूजा सूर्योदय के एक घंटे पश्चात देवी श्रृंगार एवं आरती से प्रारंभ होती है।
दोपहर में कच्ची भोग के पश्चात देवी शयन करती हैं, तब मंदिर का पट बंद रहता है। जाते हैं एवं शाम में सूर्यास्त के थोड़ी देर पहले संध्या आरती के लिए मंदिर के पट खुलते हैं। आरती के पश्चात बंद हो जाते हैं। मंदिर में रविवार एवं भाद्रपद मास को छोड़कर सभी दिन बलि चढ़ायी जाती है।
16 दिवसीय शारदीय पूजा, विशेष बलि
इस मंदिर की विशेष बात यह है कि यहां प्रतिवर्ष अश्विन कृष्ण पक्ष नवमी से शुक्ल पक्ष विजयादशमी तक धूमधाम से शारदीय नवरात्र की पूजा संपन्न होती है। उक्त अवसर पर मंदिर की शोभा देखते बनती है, शारदीय नवरात्र पूजा में बकरों की बलि के अतिरिक्त भैंसें एवं मछली बलि का भी विधान है।