टीम एबीएन, रांची। राजधानी रांची के बरियातू हाउसिंग कॉलोनी स्थित राम-जानकी मंदिर में आयोजित शिवपुराण की पांचवें दिन की कथा में पं रामदेव पाण्डेय ने आज सती शिव प्रसंग में कहा कि द्वंद्व को ही हम शक या भ्रम भी कहते हैं। इस द्वंद्व में सती, सीता, ब्रह्मा, यशोदा और अर्जुन भी पड़े।
यह द्वंद्व अपनों से ही होता है। कभी-कभी यह द्वंद पारिवारिक सुख शांति को भी छिन्न-भिन्न कर देता है। इस द्वंद्व को शीघ्र ही समाप्त कर देना चाहिए। सती को द्वंद्व है राम परम ब्रह्म हैं या नहीं। तो ब्रह्म दांपत्य जीवन में रोता है तो फिर ब्रह्म क्यों रोता है? इस द्वंद्व का समाधान शिव करते हैं।
पर शिव पर विश्वास नहीं कर राम की परीक्षा लेने जाती हैं। परिणाम शिव से हजारों साल दूर रहना पड़ा; क्योंकि शिव सती के इस कृत्य से महासमाधि में चले गये और सती को स्वयं ही पिता के यज्ञ में जलकर मरना पड़ता है। अब इस द्वंद्व का लाभ दुष्ट पड़ोसी उठाता है। तारकासुर ने फायदा उठाया कि अब शिव काम गृहस्थी से दूर हैं।
सती को माता का दर्जा दे चुके हैं, तो तारकासुर ने ब्रह्मा से आशीर्वाद लिया कि शिव के जैविक पुत्र से ही मरें या अमर रहें। इस द्वंद्व का परिणाम हुआ- दक्ष के यज्ञ का विनाश। क्योंकि दक्ष भी द्वंद में हैं। शिव अकाल पुरुष, महाकाल, त्रिलोकी नहीं श्मशानी अघोरी भी हैं। इन्हें यज्ञ में क्यों आमंत्रण करें?
यशोदा को द्वंद है यह कृष्ण देवकी बसुदेव का उद्धार कंस को मारकर पायेगा कि नहीं? अर्जुन को द्वंद है यह कृष्ण मेरा फुफेरा भाई बहनोई और रथ चालक है। यह कैसे भगवान विश्वात्मा हो सकता है?
सीता को द्वंद्व है सोने का हिरण, सोने की लंका की पर हनुमान जी ने पृथ्वी के आकार का अपना सोने का शरीर बना लिया और सीता का भ्रम दूर किया। यह काम तो राम का सेवक कर सकता है। माता-पिता तो विश्वात्मा हैं। इसलिए घर, कार्यालय, समाज और राष्ट्र में द्वंद्व है, तो शीघ्र दूर कीजिये।