टीम एबीएन, लोहरदगा। अस्सी के दशक में लोहरदगा जिला में एक निरंकारी बाबा गोविंद दास जी का आगमन हुआ था जो यहीं रच-बस गये और लोहरदगा वासियों के मन में भक्ति की गंगा बहा दी। बाबा मठ के नाम से प्रसिद्ध उनका दरबार आज संपूर्ण झारखंड के अलावा अन्य राज्यों में पहचान का मोहताज नहीं है, जहां अनेक राज्यों से आज भी उनके भक्त उनसे मिलने और दर्शन करने आते हैं।
संत शिरोमणि बाबा गोविंद दास जी ने अपने जीवन पर्यन्त सभी वर्ग के लोगों से विशेष अनुराग रखते थे। सभी भक्त बहुत ही भक्ति और उपासना से ओत-प्रोत हो बाबा के दरबार में नित्य हाजरी लगाते थे, जो सिलसिला आज तक निर्बाध गति से चल रही है। 12 मार्च 1983 को बाबा गोविंद दास जी महाराज ने समाधि ली थी तब से आज तक उनका निर्वाण दिवस में बाबा के प्रति उनके भक्तों का अटूट प्रेम, श्रद्धा और भक्ति देखते ही बनती है। ऐसी मान्यता है कि जो कोई भक्त बाबा के दरबार में आकर सच्चे मन से मन्नत मांगता है तो बाबा अवश्य उनकी मनोकामना पूर्ण करते हैं।
बाबा गोविंद दास जी का अनुराग भजन - कीर्तन में अधिक था फलत: आज भी उनका दरबार भक्तों के भजन कीर्तन से गुंज्य मान रहता है। प्रत्येक शनिवार को इनके दरबार में कड़ाह पूजन और भंडारे का आयोजन इनके भक्त करते हैं। कहा जाता है कि इनके कड़ाह में से कभी भी प्रसाद घटता नहीं है अपितु बढ़ता जाता है चाहे कितने ही भक्त प्रसाद ग्रहण करें। जिस किसी भी भक्त की मन्नत पूरी होती है या श्रद्धा से कोई भी भक्त कड़ाह पूजन करता है।
बाबा के समाधि में भक्त चादर भी चढ़ाते हैं। कहा जाता है कि जब बाबा थें तो वे अपने दरबार से कभी किसी को बिना भोग का जाने नहीं देते थे। भोग के समय वे भक्तों को खुद अपने हाथों से भोग का प्रसाद देते थे। अमीर या गरीब का बिना भेदभाव किये बाबा सभी से समान प्रेम भाव रखते थे।
बाबा के दरबार में अनेक भक्त अपनी रोग-बीमारी और समस्याएं लेकर आते थे बाबा सभी के समस्याओं को ध्यान से सुनते थे और चमत्कारिक रूप से उनका निवारण करते थें फलत: बाबा के प्रति भक्तों की श्रद्धा और भक्ति अटूट होती चली गयी जो आज भी अटूट है। बाबा की भक्ति की ही शक्ति है कि उनके दर्शन के लिए आज भी दूर-दूर से भक्तों का आना जारी है, जो कोई भी बाबा को सच्चे मन से पुकारता है तो बाबा सूक्ष्म रूप में आज भी उनके मदद करने के लिए दौड़े चले आते हैं।
यह भक्तों का विश्वास और भक्ति ही है कि भले ही आज बाबा शारीरिक रूप में भक्तों के बीच नहीं हैं पर आत्मिक रूप में आज भी वे अपने भक्तों के साथ हैं और उनका मार्गदर्शन अपने संतानों की तरह करते रहेंगे अपना आशीर्वाद देते रहेंगे। उक्त जानकारी हिमांशु कुमार ने दी।