राजकुमारी पांडेय
एबीएन सोशल डेस्क। हिंदू पंचांग के मुताबिक, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रंगभरी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी व्रत का हिंदू धर्म में अधिक महत्व है। इस बार रंगभरी एकादशी व्रत 03 मार्च दिन को है। रंगभरी एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है।
हिंदू मान्यता के अनुसार, रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव और माता पार्वती पहली बार काशी आये थे। इसलिए यह एकादशी वाराणसी में अधिक उत्साह के साथ मनायी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ भगवान शिव की पूजा अर्चना करने का विधान है। अगर आप एकादशी व्रत रख रहे हैं तो आपको एकादशी व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए।
मान्यता है कि व्रत कथा सुनने या पढ़ने से भगवान विष्णु की कृपा से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अलावा समस्त पापों से छुटकारा मिलता है। चलिये आपको बताते हैं रंगभरी एकादशी व्रत कथा के बारे में। रंगभरी एकादशी व्रत कथा प्राचीन काल में चित्रसेन नामक राजा राज्य करता था। उसके राज्य में एकादशी व्रत का अधिक महत्व था और सभी लोग एकादशी के व्रत को रखते थे।
वहीं आमलकी एकादशी (रंगभरी एकादशी) के प्रति अधिक श्रद्धा थी। एक दिन जंगल में राजा में शिकार करते हुए दूर निकल गये। तब पहाड़ी और जंगली डाकुओं ने राजा को घेर लिया। इसके बाद उन्होंने राजा पर हमला कर दिया। लेकिन देव कृपा से राजा पर जो भी शस्त्र चलाये जाते वो पुष्प में बदल जाते। डाकू अधिक थे और राजा संज्ञाहीन होकर धरती पर गिर गये। तब शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई और समस्त राक्षसों को मारकर गायब हो गयी। इसके बाद जब राजा की चेतना वापस लौटी तो उसने सभी राक्षसों को मरा हुआ देखा।
राजा इस दृश्य को देखकर आश्चर्य हुआ कि इन डाकुओं को किसने मारा? तभी आकाशवाणी हुई- हे राजन!यह सब राक्षस तुम्हारे आमलकी एकादशी का व्रत करने से मारे गये हैं। तुम्हारे शरीर से आमलकी एकादशी की शक्ति से इन लोगों का संहार किया है। इन सभी को मारकर वहां दुबारा से तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर गयी। इस बात को राजा सुनकर बेहद प्रसन्न हुआ और वापस लौटकर राज्य में सबको एकादशी का महत्व के बारे में बताया।
रंगभरी तथा आमलकी एकादशी व्रत कथारंगभरी एकादशी को फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी कहा जाता है। इसे आमलकी एकादशी व्रत कहते हैं। रंगभरी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ आंवले की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस एकादशी के दिन भगवान शिव पहली बार माता पार्वती को काशी लाये थे। इसलिए यह एकादशी बाबा विश्वनाथ के भक्तों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
रंगभरी एकादशी व्रत कथा
प्राचीन काल में चित्रसेन नामक राजा था। उसके राज्य में एकादशी व्रत का बहुत महत्व था। राजा समेत सभी प्रजाजन एकादशी का व्रत श्रद्धा भाव के साथ किया करते थे। राजा की आमलकी एकादशी के प्रति बहुत गहरी आस्था थी। एक बार राजा शिकार करते हुए जंगल में बहुत दूर निकल गये। उसी समय कुछ जंगली और पहाड़ी डाकुओं ने राजा को घेर लिया और डाकू शस्त्रों से राजा पर प्रहार करने लगे, परंतु जब भी डाकू राजा पर प्रहार करते वह शस्त्र ईश्वर की कृपा से पुष्प में परिवर्तित हो जाते। डाकुओं की संख्या अधिक होने के कारण राजा संज्ञाहीन होकर भूमि पर गिर गये। तभी राजा के शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई और उस दिव्य शक्ति ने समस्त दुष्टों को मार दिया, जिसके बाद वह अदृश्य हो गयी।
जब राजा की चेतना लौटी, तो उसने सभी डाकुओं को मरा हुआ पाया। यह दृश्य देखकर राजा को आश्चर्य हुआ। राजा के मन में प्रश्न उठा कि इन डाकुओं को किसने मारा। तभी आकाशवाणी हुई कि हे राजन! यह सब दुष्ट तुम्हारे आमलकी एकादशी का व्रत करने के प्रभाव से मारे गये हैं। तुम्हारी देह से उत्पन्न आमलकी एकादशी की वैष्णवी शक्ति ने इनका संहार किया है। इन्हें मारकर वह पुन: तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर गयी।
यह सारी बातें सुनकर राजा को अत्यंत प्रसन्नता हुई, एकादशी के व्रत के प्रति राजा की श्रद्धा और भी बढ़ गयी। तब राजा ने वापस लौटकर राज्य में सबको एकादशी का महत्व बतलाया।