राजकुमारी पांडेय
एबीएन सोशल डेस्क। एक बार मां पार्वती ने शिव शंकर से पूछा कि ऐसा कौन सा श्रेष्ठ और सरल व्रत -पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं? उत्तर में शिवजी ने पार्वती मां से कहा कि शिवरात्रि के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनायें :-
एक गांव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुंब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर ना चुका सका। क्रोधश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि था। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिनसारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिये निकला, लेकिन दिन भर बंदीगृह में रहने के कारण भूख प्यास से व्याकुल था।
शिकार करने के लिए वह एक तलाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बेलपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता नहीं चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ी, संयोग से शिवलिंग पर गिरी। इस प्रकार दिन भर भूखे प्यासे शिकारी का व्रत भी पूरा हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गये। एक रात्रि बीत जाने पर एक गर्भणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची।
शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची मृगी बोली मैं गर्भणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवो की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब तुम मुझे मार लेना। शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गयी। कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना ना रहा।समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया हे पारधी... मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतू से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहणी हूं।
मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी। शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने वाला ही था कि मृगी बोली है पारधी... मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मार।
शिकारी हंसा और बोला, सामने आएं शिकार को छोड़ दूं मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं।मेरे बच्चे भूख प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी... मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हैं।
मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गयी। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़ तोड़ कर नीचे फेकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो तो एक हृष्ट पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला हे पारधी... भाई यदि मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियो और छोटे-छोटे बच्चों को को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं।
यदि उन्हें तुमने जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊंगा। मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तो मृग ने कहा, मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबंध होकर गई है। मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पायेंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सब के साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।
उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गये। भगवान शिव के अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारूणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा। थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता और सामूहिक प्रेम भावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गयी।
उसमें एक परिवार को न मार कर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल और दयालु बना लिया। देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी और मृग मोक्ष को प्राप्त हुए।