- हुनर को मिली पहचान, रोजगार के अवसर हो रहे सृजित
- पर्यटकों को आकर्षित कर रहा पलामू का हस्तशिल्प
- सरकार के प्रयास से रोजगार से जुड़ रहे स्थानीय, घर से ही हो रहा हुनरमंदों के उत्पाद का व्यापार
टीम एबीएन, पलामू/ रांची। पलामू में पर्यटन संवर्द्धन के साथ-साथ स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय फलक पर पहुंचाने की कोशिश हो रही है। पर्यटन स्थलों पर एक ओर जहां पर्यटकीय सुविधा बढ़ाई जा रही है। वहीं स्थानीय व्यक्तियों को हुनरमंद बनाने की दिशा में भी निरंतर कार्य हो रहे हैं। हुनर की पहचान मिले और लोग रोजगार से जुड़कर आमदनी बढ़ा सके, इसके लिए सरकार के साथ स्थानीय प्रशासन जुटी है। महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है।
वहीं ग्रामीण क्षेत्र के पुरूष वर्ग को स्वयंसेवी संस्थाओं से जोड़कर रोजगार मुहैया कराई जा रही है। महिला-पुरूषों को हुनरमंद बनाने से लेकर उनके द्वारा निर्मित हस्तशिल्प को बाजार उपलब्ध कराने का कार्य भी जोरो से चल रहा है। निर्मित वस्तुओं का उचित मूल्य मिले, इसके लिए प्रयास हो रहे हैं। इसी कड़ी में शामिल है पथिक ग्राम दुकान।
पलामू प्रमंडल के दुबियाखांड़-नेतरहाट मुख्य मार्ग पर सेसा प्रशिक्षण केन्द्र परिसर में अवस्थित पथिक ग्राम दुकान में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा निर्मित हस्तशिल्पों को न केवल प्रदर्शित किया गया है, बल्कि बिक्री भी की जा रही है। यह दुकान दुबियाखांड से बेतला सड़क की ओर करीब 1.5 किलोमीट पर स्थित है। बेतला राष्ट्रीय उद्यान, केचकी संगम, पहाड़ों की रानी नेतरहाट जैसे नामचीन पर्यटन स्थलों सहित अन्य नैसर्गिक सुंदरताओं का दीदार करने पलामू पहुंच रहे पर्यटकों को सड़क के दोनों ओर घने वनों की सुंदरता के बीच अवस्थित पथिक ग्राम दुकान एक बार यहां रूकने का इशारा करता है।
यहां भगवान बिरसा मुंडा, शहीद नीलाम्बर-पीताम्बर, मेदिनीराय आदि की मूर्तियां उपलब्ध है। साथ ही जूट से बने पायदान, बैग, झारखंडी संस्कृति को जोड़ती कलात्मक वस्त्र, मिट्टी से बने डिजाइनर दीया, जूट, बांस एवं मिट्टी के आकर्षक गहने, स्टैंडिंग मॉडल, पेन-पेंशिल बॉक्स, जूट के थैले, माला, आर्टिफिशियल ज्वेलरी आदि सामग्री हल्के एवं उचित मूल्य पर उपलब्ध है।
प्रशिक्षण देकर आजिविका को किया जा रहा सशक्त : नाबार्ड, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के हस्तशिल्प विभाग, वन विभाग की पलामू दक्षिणी वन प्रमंडल के सहयोग से जूट, बांस, मिट्टी के उपकरण बनाने का प्रशिक्षण समय-समय पर दिया जाता है। प्रशिक्षणार्थियों को आर्टिजन कार्ड भी उपलब्ध कराये गये हैं। प्रशिक्षक झारखंड एवं दूसरे राज्यों के भी आते हैं। महिलाओं को सामग्री भी उपलब्ध कराई जाती है, ताकि उन्हें कच्चा सामग्री की खरीद के लिए इधर-उधर नहीं जाना पड़े। पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखकर वस्तु तैयार की गयी है। प्रशिक्षणार्थियों को प्रशिक्षण के निमित छात्रवृति भी दी जाती है। प्रशिक्षक गांव-गांव जाकर 15 दिनों एवं 1 माह का प्रशिक्षण देते हैं, ताकि ग्रामीण महिलाओं के हुनर का विकास हो सके और वे रोजगार से जुड़कर अपनी आमदनी बढ़ा सकें। समय-समय पर पुरूष वर्ग को भी प्रशिक्षण दिया जाता है। जूट के अधिकांश उत्पाद पुरूष वर्ग ही तैयार करती है।
नाबार्ड डीडीएम शालीन लकड़ा ने बताया कि नाबार्ड द्वारा संपोषित पथिक ग्राम दुकान का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं द्वारा स्वयं सहायता समूह के अंतर्गत उत्पादित व निर्मित हस्तशिल्प सामग्री के विपणन हेतु एक बाजार उपलब्ध करवाना है। इसके माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से स्वावलंबी व सशक्त किया जा सकता है। पर्यटकों को उनकी मांग के अनुरूप सामग्री मिल रहा है। साथ ही राज्य एवं राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय फलक पर स्थानीय चीजों की पहुंच बढ़ रही है। नाबार्ड दुकान संचालन के लिए सेसा संस्था को फैसिलिटेट कर रही है।
पथिक ग्राम दुकान का संचालन कर रही संस्था सेसा के सचिव कौशिक मल्लिक ने बताया कि- इसमें ग्रामीण महिलाओं द्वारा निर्मित डोकरा आर्ट एवं हस्तशिल्प के विभिन्न उपयोगी एवं सजावटी सामग्री उपलब्ध कराया जा रहा है, जिसे पर्यटक एवं स्थानीय लोग पसंद कर रहे हैं। एक्सक्लूसिव हैंडीक्राफ्ट आउटलेट में बिक्री उपरांत प्राप्त सहयोग राशि का उपयोग विभिन्न समाजोन्मुखी कार्यक्रम जैसे महिला शिक्षा, वस्त्र वितरण, सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना एवं स्थानीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के कार्य में उपयोग किया जायेगा। कुछ सामग्री पुरूष वर्ग द्वारा भी तैयार किया गया है।
अजय कुमार जूट से सामग्री निर्माण कार्य का प्रशिक्षण देते हैं। वे खूद भी वस्तू निर्माण करते हैं। उन्होंने बताया कि ग्रामीण महिलाओं एवं युवतियों को प्रशिक्षण देकर जूट से पायदान, वाटर बोतल रखने का थैला एवं अन्य हैण्डिक्राफ्ट निर्माण का प्रशिक्षण देकर उन्हें उनके घर पर ही रोजगार से जोड़ा जाता है।