समाज
उरांव आदिवासी वीरांगना सिनगी दई : खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी...
ABN Bureau
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21 Oct, 2021
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रांची (डॉ ललन शर्मा)। इस पंक्ति को हम सबने अपने पाठ्यक्रमों में जरूर पढ़ा होगा एवं बार-बार पढ़ कर गर्व की अनुभूति भी की होगी। परंतु शायद ही किसी को पता होगा कि 14-15वीं सदी में सुदूर जंगल क्षेत्र की एक आदिवासी राजकुमारी ने केवल महिलाओं को संगठित कर तुर्कों की एक बड़ी सेना को तीन-तीन बार पराजित किया था। भारत का आधुनिक इतिहास इन जैसी वीरांगनाओं को भले ही भूल जाए, पर वो समाज जिसके संपूर्ण अस्तित्व के रक्षण का काम ही जिसने किया हो, वह समाज उसे कैसे भूल सकता है! यही कारण रहा है कि आज भी संपूर्ण उरांव समाज चाहे वह भारत के किसी भी कोने में क्यों ना बसा हो हर 12 वर्ष पर उस उरांव राजकुमारी की वीरता को याद करने एवं उनके प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित करने हेतु जनी शिकार का उत्सव मनाता है। महीने भर अपनी अपनी सुविधा से हर गांव की छोटी से बड़ी आयु की सभी स्त्रियां पुरुष वेश में जंगल को शिकार करने निकलती हैं, सब के हाथ में कोई ना कोई अस्त्र-शस्त्र यथा तीर-धनुष, कुल्हाड़ी, फरसी, दौवली, बलुआ, हँसुआ आदि अवश्य ही होता है।
14-15वीं शताब्दी के करीब रोहतासगढ़, जो वर्तमान में बिहार के सासाराम के करीब मौजूद है, वहां पर उस समय उरगन ठाकुर (रूईदास) नामक एक उरांव राजा हुआ करते थे, लोगों का मानना है कि वे लोग सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के वंशज थे। सुरक्षा की दृष्टि से रोहतास गढ़ का किला घने जंगलों के बीच एक ऊंची पहाड़ी पर अवस्थित था परन्तु नीचे समीप में सोन नदी बहती थी इस कारण पशुपालन एवं खेती अच्छी थी, फलस्वरूप उस समय का उरांव साम्राज्य काफी समृद्ध था जिसकी ख्याति दूर दूर तक फैली हुई थी। तुर्कों की बुरी नजर तो उनके साम्राज्य पर बहुत पहले से थी, उन्होंने कई बार रोहतासगढ़ पर आक्रमण भी किया, पर राजा उरगन ठाकुर के कुशल नेतृत्व और सैन्य शक्ति के कारण तुर्कों को हर बार मूँह की खानी पड़ी। थक हार कर तुर्कों ने भेदनीति का सहारा लिया एवं लुन्दरी नामक एक महिला से, जो राजा के यहां दूध पहुंचाने जाती थी, के माध्यम से तुर्कों ने राज्य की कमजोरियों का भेद लिया। लुन्दरी ने तुर्कों को बताया कि बैसाख माह में हर वर्ष विशु सेंदरा का आयोजन होता है एवं उस दिन राज्य के राजा अपनी प्रजा और सैनिकों के साथ शिकार पर जाते हैं एवं खान-पान और नाच-गान के कार्यक्रम में व्यस्त रहतें हैं, तो यह एक सही मौका हो सकता है आक्रमण कर रोहतासगढ़ किले पर जीत हाशिल करने का। यह सुन कर तुर्कों ने रोहतासगढ़ किले पर आक्रमण करने की रणनीति बनाई एवं विशु सेंदरा के दिन अपने सैनिको के साथ हमला करने रोहतासगढ़ पहुंचे। जब तुर्क की सेना वहां पहुंची तो आश्वस्त थी कि वहां पर उनका सामना निहत्थे एवं विशु सेंदरा के उल्लास में नाचते-गाते-झूमते हुए सैनिको से होगा, पर वहां पहुंचने पर किले के अंदर से बड़े-बड़े पत्थरों एवम् तीर-धनुष से उनपर जोरदार आक्रमण हुआ। तुर्की सेना को इस तरह की किसी भी जवाबी कारवाई का जरा भी पूर्वाभास नहीं था, और इससे घबरा कर वे भाग खड़े हुए। इस प्रकार वे लगातार तीन बार मार खा - खा कर पराजित हुए। सिनगी दई के नेतृत्व में रोहतास गढ़ की सेना पहाड़ी से नीचे उतरकर सोन नदी के उसपार तक तुर्कों को खदेड़ चूकी थी, अबतक उनकी सेना की कमर टूट चूकी थी एवं हताश सैनिक वापसी की तैयारी करने लगे थे।
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