टीम एबीएन, रांची। कृष्ण के जन्म के समय जो राजनीतिक, सामाजिक और पारिस्थितिक स्थिति थी, आज भी वैसी ही स्थिति से हमारा देश गुजर रहा है। महाभारत के सभी राष्ट्र द्वारिका और मथुरा को पाने के लिए लालायित थे। मथुरा में पिता, बहन और जीजा को बंदी बनाने वाला कंस, राजगीर में हजारों राजाओं को बंदी बनाने वाला जरासंध, सोलह हजार युवतियों को कैद रखने वाला भोमासुर गोहाटी में शासक था। नागपुर में शिशुपाल, हिमाचल में मानव खाने वाला राक्षस हिडिंब था। दुर्योधन अपने भाइयों को कभी लाक्षागृह में जलाने की योजना बनाता, तो कभी अज्ञातवास भेजता। राजदरबार में स्त्री हिंसा की पीड़िता द्रौपदी थी। ऐसे स्थिति में कृष्ण ने जन्म लेकर भारत की दुर्दशा से आहत हुए और राजनीति और कूटनीति से धर्म से पुष्ट महाभारत बनाने के लिए हस्तिनापुर को केंद्र बनाकर योद्धाओं को साथ लिया और कुरुक्षेत्र में लड़ाई लड़ी थी। इसी जगह पर पलासी का युद्ध भी हुआ। यह भी संयोग है कृष्ण ने भारत में धर्म की स्थापना की। यह संदेश दिया कि धर्म ही सर्वोपरि है। भले ही कुल का नाश हो जाये। अधर्मी संतान को संरक्षण नहीं देना चाहिए। उक्त बातें भागवत कथा मर्मज्ञ पंडित रामदेव पांडेय ने कही। बताते चलें कि इस कथा का आयोजन महिला भक्ति परिषद् रांची यूनिवर्सिटी कॉलोनी बरियातू के राम मंदिर में हो रहा है। गुरुवार को रूक्मिणी कृष्ण विवाह का प्रसंग होगा।