कहां दिखेगा, कब करें पूजा पाठ, क्या है सूतक काल
एबीएन नॉलेज डेस्क। तीन मार्च को पूर्ण चंद्रग्रहण है। इसे खास माना जा रहा है। जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा तीनों ही एक लाइन में आ जाते हैं, तो पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। इसे ही चंद्र ग्रहण कहते हैं। इस दौरान चंद्रमा लाल नजर आयेगा। इसे ब्लड मून भी कहा जाता है। यानी चंद्रमा सीधे पृथ्वी की छाया से गुजरेगा। मंगलवार शाम को चमकीले और पूर्ण चंद्रमा पर एक गहरी छाया पड़नी शुरू हो जायेगी। एक बार जब चंद्रमा पूरी तरह से छाया में डूब जायेगा, तो वह लाल रंग की चमक लेने लगेगा।
अगर मौसम साफ रहा तो आप इसे देख सकते हैं। खगोलविदों के अनुसार पूर्वोत्तर भारत में दृश्यता बेहतर रहने की संभावना है, लिहाजा वहां पर इसे स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है। असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड और मिजोरम में देखा जा सकेगा। आप इसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता से भी देख सकते हैं।
हालांकि, यहां से शायद उतना क्लियर विजन न आये। इसे देखने के लिए विशेष चश्मे की जरूरत नहीं है। आप नंगी आंखों से इसे देख सकते हैं। इसका स्वास्थ्य पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा। वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है। अत: इसका स्वास्थ्य या दैनिक जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, धर्म-कर्म के जानकार ऐसा नहीं मानते हैं।
शास्त्रों में चंद्र ग्रहण को लेकर कई तरह की बातें लिखी हैं। ग्रहण शुरू होने से पहले ही सूतक काल की शुरुआत हो जाती है। इस काल के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं होता है। इस बार भी नौ घंटे पहले सूतक काल की शुरुआत हो रही है। आप सूतक काल में पूजा-पाठ नहीं कर सकते हैं। ग्रहण समाप्त होने के बाद लोग स्नान और पूजा पाठ करते हैं।
ज्योतिष अनुसार 3 मार्च को सुबह 09:39 बजे से सूतक काल शुरू हो जायेंगे, जो ग्रहण समाप्त होने के साथ खत्म होंगे। दिल्ली के प्रसिद्ध कल्काजी मंदिर के महंत पीठाधीश्वर सुरेंद्रनाथ अवधूत ने एबीएन को बताया, इस बार का चंद्र ग्रहण दोपहर 3:20 से शुरू होकर 6:57 तक रहेगा।
पंडित उमाशंकर मिश्र का कहना है कि ग्रहण काल के दौरान मंत्र जप और मानसिक पूजा श्रेष्ठ मानी गयी है। ग्रहण समाप्त होने के बाद (शाम 06:57 बजे के बाद) पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें, स्नान करें और दान-पुण्य करें। इसके बाद ही अगले दिन यानी 4 मार्च को सुरक्षित और हर्षोल्लास के साथ होली का आनंद लें।
लखनऊ के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डॉ उमाशंकर मिश्र का कहना है कि ग्रहण काल के दौरान सिंह, कन्या और कुंभ राशि वालों को विशेष सावधानी बरतें, जबकि मेष और मिथुन के लिए समय शुभ रहेगा। ग्रहण काल में नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ज्योतिषीय दृष्टि से इससे बचें।
धार्मिक मान्यता है कि जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था, तब राहु ने अमृत पान कर लिया था। वह असुर था। इसलिए भगवान विष्णु ने उसका सिर काट दिया। उसके सिर को राहु और उसके धड़ को केतु कहा जाता है। मान्यता है कि तभी से राहु और केतु, सूर्य और चंद्रमा को ग्रसते हैं, इसलिए ग्रहण लगता है।
चंद्रमा लाल क्यों हो जाता है?
दरअसल, चंद्रमा के सामने जब पृथ्वी आती है, तो उसकी छाया चंद्रमा पर पड़ती है। इस वजह से ब्लड मून दिखता है। इसकी लालिमा उस समय पृथ्वी के वायुमंडल की स्थिति पर निर्भर करती है। वायुमंडल में जितना अधिक धूल होगा, उतनी ही कम रोशनी निकल पाएगी, इससे चंद्रमा गहरा लाल दिखेगा। इसके ठीक उलट, अगर वायुमंडल में धूल भरा नहीं होगा, तो यह रोशनी को अधिक मात्रा में गुजरने देगा, इसलिए चंद्रमा नारंगी रंग का दिखाई देगा।
वायुमंडल से केवल लाल प्रकाश ही गुजर पाता है, क्योंकि नीला प्रकाश (जिसकी तरंगदैर्ध्य कम होती है) बिखर जाता है। इसे रेले प्रकीर्णन कहा जाता है। यही वह प्रक्रिया है जिसके कारण आकाश नीला दिखाई देता है। नीला प्रकाश वायुमंडल से होकर चंद्रमा की ओर नहीं जाता, क्योंकि यह पूरे आकाश में बिखर जाता है। दिन के समय आकाश में हम कहीं भी देखें, हमारी नजर नीले प्रकाश की उन बिखरी हुई किरणों में से किसी एक पर जरूर पड़ेगी।
आकाशीय मिसअलाइमेंट
क्योंकि सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा के सापेक्ष चंद्रमा की कक्षा बहुत थोड़ी झुकी हुई है, इसलिए तीनों पिंड हमेशा पूरी तरह से एक सीध में नहीं आते जिससे हम पूर्ण चंद्र ग्रहण देख सकें। अगले छह चंद्र ग्रहणों के दौरान, चंद्रमा पृथ्वी की छाया में पूरी तरह से डूबने के बजाय केवल कुछ देर के लिए ही प्रवेश करेगा।