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अहंकार सबसे कष्टदायक, क्योंकि यह हमें स्वयं के प्रति सजग बनाता है

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अहंकार सबसे कष्टदायक, क्योंकि यह हमें स्वयं के प्रति सजग बनाता है
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एबीएन एडिटोरियल डेस्क (परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती)। अहंकार अन्तिम अवरोध है। अहंकार सबसे अधिक कष्ट देता है, क्योंकि यह हमें स्वयं के प्रति सजग बनाता है, हमें हमारे नाम, यश, पद और प्रतिष्ठा का ख्याल कराता है। यह हमें पूरी तरह स्व-केन्द्रित बना देता है। और यह अहंकार ही है जो हमें कर्मों के बंधन में जकड़ देता है और हमें धर्म से विमुख कर देता है। इसी वजह से हम कर्म को जिम्मेदारी के बजाय बोझ समझते हैं। और यह अहंकार इच्छाओं और कामनाओं द्वारा पोषित होता रहता है। अहंकार को सम्भालने के लिए अपने आप से समझौता करना आवश्यक है, क्योंकि जब तक अहं भाव बना रहेगा तब तक अपने परिवेश के साथ तुम्हारी क्रिया-प्रतिक्रिया चलती रहेगी, दूसरों के साथ संघर्ष होता रहेगा। तुम्हारी प्रतिक्रियाओं में मन की नकारात्मक वृत्तियां ही अभिव्यक्त होंगी। तुम दूसरों के कथनों पर प्रतिक्रिया करोगे और उनसे बदला लेने की कोशिश करोगे। जब तक अहंकार नियंत्रण में नहीं आता, तब तक समझौता नहीं होता। और जब अहंकार नहीं रहता, तब समझौता आसानी से हो जाता है और कर्म कर्मयोग में बदल जाता है। मानव धर्म का पालन करते जाओ, अहंकार को सिर मत उठाने दो, दूसरों की परिस्थिति, चिन्तन और आवश्यकताओं को समझने का प्रयास करो, और जिस तरह अपनी भलाई के लिए काम करते हो, वैसे ही दूसरों के उत्थान के लिए भी प्रयासरत रहो। ये कर्मयोगी के लक्षण हैं। कर्मयोग एक आन्तरिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम अपने चरित्र को विक्षेपरहित और परिष्कृत बना सकते हैं। जब हम कर्म के साथ योग शब्द को जोड़ते हैं, तब इसका तात्पर्य एक ऐसी क्षमता से होता है जिसके द्वारा हम मन और अहंकार के थपेड़ों से अप्रभावित रहते हुए अपनी जीवन-यात्रा सहजता और सुगमता से संपन्न करते हैं, अपने कर्मों को सकारात्मक, सृजनात्मक और उत्कृष्ट बनाने का प्रयास करते हैं। यही कर्मयोग की संपूर्ण प्रक्रिया है। (साभार : कर्म और कर्मयोग)
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