एबीएन डेस्क, रांची। कोरोना महामारी की चुनौतियों से इस वक्त भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व लड़ रहा है। वैश्विक महामारी के चलते दुनियाभर के देशों में रोजगार सृजन एक प्रमुख समस्या उभरकर सामने आई है। इस समस्या को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार अपने भाषणों में आत्मनिर्भर भारत बनाने की बात कर रहे हैं। जिसका उद्देश्य कोरोना महामारी से लड़ना नहीं बल्कि भविष्य के भारत का निर्माण करना है। कई दशकों तक भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए बंद थी। लेकिन आर्थिक संकटों से जुझ रहे भारत ने अपने बाजार को 1991 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिए दुनिया के लिए खोल दिया। ऐसे वक्त में जब विदेशी कंपनियों ने भारत को अपने आगोश में ले रखा है। उस स्थिति में स्वदेशी वस्तुओं के जरिए बाहरी कंपनियों के उत्पादों को टक्कर देना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। भारत को आत्मनिर्भर बनाने का मतलब दुनिया से नाता तोड़ने जैसा नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री जो कह रहे हैं उसे निभाना आसान नहीं होगा। मौजूदा समय में अमेरिका और चीन हमारे जीवन से जुड़ी वस्तुओं के जरिए सीधा दखल दे रहे हैं। इसके अलावा सरकार को स्वदेशी वस्तुओं के निर्माण के लिए निमार्ताओं को आर्थिक सहायता भी मुहैया करानी होगी, जिससे विश्व व्यपार संगठन के साथ भारत का सीधा मुकाबला हो। मार्च 2020 से ही विश्व की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाएं परिणामी स्वास्थ्य व आर्थिक क्षेत्र में हो रही गिरावट के चलते तनाव में हैं। इसके परिणामस्वरूप कई उद्योग और संगठन या तो बंद हो गए हैं या न्यूनतम क्षमता पर काम कर रहे हैं और इसका प्रभाव अब वैश्विक स्तर पर दिखाई दे रहा है। एनआईपी के रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया में जनसंख्या के मामले में दूसरे, अर्थव्यवस्था में 5वें और इंफ्रास्ट्राक्चर के मामले में 70वें स्थान पर है। जो एक तरह से चिंताजनक स्थिति है। इस रिपोर्ट में अलग-अलग क्षेत्रों की प्राथमिकताओं और उनकी चुनौतियों की पहचान की गई तथा इसके समाधान के लिये एक रूप रेखा तैयार की गई है। देश में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के क्षेत्र में तीव्र सुधार हेतु विभिन्न क्षेत्रों से 7000 परियोजनाओं को चिन्हित किया गया है। पिछले कई वर्षों में यह देखा गया है कि अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं बहुत ही सहायक रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा 2001 में प्रारंभ किये गए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की शुरूआत के दौरान भी देश की आर्थिक स्थिति बहुत ठीक नहीं थी। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं के लंबित होने के कारण अधिकांश बैंक ऐसी परियोजनाओं के लिये ऋण उपलब्ध कराने से बचती नजर आ रही हैं। वर्तमान परिस्थिति में अधिक लागत वाली बड़ी परियोजनाओं को शुरू करना और उनके लिए धन जुटाना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है। अधिकांश बड़ी परियोजनाओं को पूरा होने में समय लग जाता है। जिससे सरकारों के बदलने और सरकार की नीतियों में बदलाव के कारण निजी क्षेत्रों की भागीदारी पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ता है। महामारी के कारण बेहाल अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए केद्र सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम में ऐसी योजनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए जिसे कम समय में पूरा किया जा सके। ताकि इन परियोजनाओं से अर्थव्यवस्था को आसानी से पटरी पर लाने में मदद मिल सके। इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं में आर्थिक संकटो का सामना करना पड़ता है। जिससे के निजी क्षेत्र के कंपनियों को तय समय सीमा के अंदर काम को पूरा करना कठिन होता है। सरकार को विकास वित्तीय संस्थान की स्थापना के लिए कदम उठाना चाहिए जिससे ऐसी परियोजनाओं के लिए निर्धारित ब्याज दर पर 20-25 वर्षों के लिए ऋण उपलब्ध करा सके। ऐसे संस्थानों के स्थापना से परियोजना से जुड़ी कंपनियों को बैंकों के दरवाजे को खटखटाना नहीं पड़ेगा और एनपीए की समस्या से निजात मिलेगा। दिल्ली मेट्रो जैसी बड़ी परियोजनाओं को इस लिए शुरू किया जा सका था क्योंकि इनके लिए जापान से लंबी अवधि का ऋण उपलब्ध कराया गया था। गौरतलब है कि आम बजट 2021 में सरकार की ओर से भारत की आर्थिक विकास दर स्थिर रखने के लिए लंबे समय तक चलने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर विशेष बल दे रही है। इस योजना के साथ सरकार ने विकास वित्तीय संस्थान (डीएफआइ) की स्थापना पर पुन: विचार करने का प्रस्ताव किया है। आजादी के बाद से देश के विकास को तेज गति देने के लिए डीएफआई 1948 में भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (आइएफएसआइ) की स्थापना के साथ प्रारंभ हुआ था। लेकिन 1970-80 के दशक के दौरान डीएफआई में राजनीति हस्तक्षेप के कारण लाभ पहुंचाने के लिए प्रभाव वाले निजी क्षेत्र की कंपनियों को ऋण दिया गया। परिणति के रुप में संस्थान एनपीए हो गया। मामला सामने आने के बाद 1991 में नरसिंहम समिति की सिफारिश के बाद डीएफआई को भंग कर दिया गया और तत्कालीन सक्रिय विकास वित्तीय संस्थानों को वाणिज्य बैंको में बदल दिया गया था। कोरोना के कारण उपजी हुई परिस्थितियों में आत्मनिर्भर भारत अभियान में तमाम चुनौतियों होने के बावजूद मजबूती के लिए औद्योगिक निवेश की आवश्यकता है। जिससे रोजगार सृजन के साथ वैश्विक ताकत के साथ देश को उभारने में मददगार साबित हो। मनरेगा जैसी रोजगार परक योजनाओं में पारदर्शिता लाने, 100 दिन के कार्य दिवस और मजदूरी दर को बढ़ाने पर सरकार को बल देना चाहिए। जिससे गांव के लोगों को असानी से गांव में ही रोजगार मिल सके। भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद कई क्षेत्रों में अपनी उत्पाद क्षमता में वृद्धि की है। परंतु अन्य कई अन्य कई क्षेत्रों में भी जहां बेहतर संभावनाएं हैं। भारतीय कंपनियां उत्पादन से हटकर व्यापार में अधिक सक्रिय रही हैं। पूर्व में भारत को स्टील उत्पाद, सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार में आत्मनिर्भर के लिए किये गए प्रयास में काफी सफलताएं मिली हैं।