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क्या अराजकता का शिकार हो रहा है देश

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क्या अराजकता का शिकार हो रहा है देश
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एबीएन डेस्क, रांची। करीब 60 वर्ष पहले जॉन केनेथ गालब्रेथ (सन 1961-63 तक भारत में अमेरिका के राजदूत) ने भारत को एक क्रियाशील अराजकता के रूप में परिभाषित किया था। कोविड-19 महामारी से जुड़ी तमाम हृदयविदारक खबरें सामने आ रही हैं। सरकार समय पर टीकाकरण करने में अक्षम रही है। सामूहिक अंतिम संस्कार और शवों को नदियों में बहाए जाने संबंधी रिपोर्ट आने के बाद देशवासियों को लगने लगा है कि क्या हम एक निष्क्रिय अराजकता के शिकार हैं। सरकार दावा कर सकती है कि कोविड की दूसरी लहर की संक्रामकता का अनुमान लगा पाना मुश्किल था। परंतु निजी क्षेत्र और चिकित्सा शोध संस्थानों के साथ सहयोग करके घातक कोविड-19 वायरस की रोकथाम करने संबंधी आवश्यकता तो एकदम स्पष्ट थी। सरकार को सन 2020 केमध्य तक ही टीका उत्पादन के लिए पर्याप्त वित्तीय मदद मुहैया करा देनी चाहिए थी। इसके बजाय प्रधानमंत्री मोदी 28 जनवरी 2021 को दावोस में कोविड को लेकर एकदम आश्वस्त और स्वयं की सराहना करते दिखे। मई 2021 के मध्य तक सरकार और नीति आयोग के प्रवक्ता यही सुझा रहे थे कि उन्होंने कोविड-19 की दूसरी लहर का अनुमान लगा लिया था और इस विषय में सार्वजनिक घोषणाएं कर दी थीं। यह दावा एकदम झूठा है। यदि सरकार और उसके विभाग दूसरी लहर के संभावित बड़े खतरे से अवगत थे तो देश में टीका उत्पादन क्यों नहीं बढ़ाया गया। बल्कि छह करोड़ टीके विदेश भेजकर ऐसा जताया गया मानो देश की जरूरतों के लिए पर्याप्त टीके मौजूद हों। इन दिनों विदेशों में विकसित टीकों पर बौद्धिक संपदा अधिकार समाप्त करने की मांग काफी जोरशोर से हो रही है। जो टीके अभी भारत में इस्तेमाल नहीं किए जा रहे हैं अगर उन पर ऐसे बौद्घिक संपदा अधिकार समाप्त भी कर दिया जाए तो भी देश में उन टीकों का भारत में उत्पादन शुरू होने में कम से कम छह महीने लगेंगे। मई 2021 के अंत में भारत के लिए सबसे बेहतर है कि वह सीरम इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया और भारत बायोटेक द्वारा निर्मित टीकों कोविशील्ड और कोवैक्सीन का उत्पादन बढ़ाये। इसके लिए उन्हें अधिक से अधिक पूंजी मुहैया कराई जाए और उत्पादन तेजी से बढ़ाया जाए। बीबीसी की 5 मई, 2021 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के कुछ राज्यों में प्रति 10,000 लोगों पर 10 से भी कम चिकित्सक हैं और कुछ अन्य राज्यों में यह अनुपात पांच से भी कम है। बीबीसी ने ब्रिटेन की नैशनल हेल्थ सर्विस का जिक्र नहीं किया जहां 26,000 भारतीय मूल के चिकित्सक हैं और उन्होंने अपनी चिकित्सा की पढ़ाई भी भारत में पूरी की है। 13 मई, 2021 को न्यूयॉर्क पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में कहा गया कि भारत में हर 10,000 आबादी पर नौ चिकित्सक हैं जो वैश्विक औसत का आधा और अमेरिका के तिहाई के बराबर है। आलेख के अनुसार देश की दोतिहाई आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है जहां देश के केवल 20 फीसदी चिकित्सक हैं। नर्सों की कमी से हालात और बिगड़ सकते हैं। अमेरिका में भारतीय मूल के एक लाख चिकित्सक हैं। इनमें से अधिकांश ने अपनी मेडिकल डिग्री भारत से ली लेकिन न्यू यॉर्क की रिपोर्ट में इन आंकड़ों का कोई उल्लेख नहीं है। ब्रिटेन और अमेरिका में भारतीय मूल की नर्स भी बहुत बड़ी तादाद में रहती हैं। सकारात्मक संदर्भ में बात करें तो ऊंचे वेतन और बेहतर माहौल के लिए विदेश में रहने का विकल्प होने के बावजूद बहुत बड़ी तादाद में चिकित्सकों और नर्सों ने भारत में काम करने का निर्णय किया। बीते 14 महीनों में देश में चिकित्सकों, नर्सों और सहायक कर्मचारियों ने घातक संक्रमण की आशंका के बीच दिन रात काम किया है। भारतीय चिकित्सा महासंघ (आईएमए) ने मई के मध्य में कहा कि कोविड-19 की पहली लहर में उसके पास पंजीकृत 728 चिकित्सकों का निधन हुआ। दूसरी लहर के दौरान भी 420 चिकित्सकों का निधन हुआ। देश में कोविड से कितनी नर्सों की जान गई इस बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों को उन चिकित्सकों और नर्सों के परिवारों के बारे में जानकारी जुटानी चाहिए जिन्होंने कोविड के कारण जान गंवा दी। एक अलग मामले में केयर्न एनर्जी पर अतीत से प्रभावी कर के मामले में हमें एक बार फिर केंद्र सरकार की अदूरदर्शिता का सामना करना पड़ रहा है। मीडिया में आई रिपोर्ट के अनुसार केयर्न ने अब एक अमेरिकी अदालत में एयर इंडिया को निशाने पर लिया है। इसने ऐसा 1.2 अरब डॉलर का वह मध्यस्थता अवार्ड हासिल करने के लिए किया है जो उसने दिसंबर 2020 में हेग में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जीता था। जानकारी के मुताबिक भारत सरकार इस मध्यस्थता अवार्ड को चुनौती देने की तैयारी कर रही है और वह इस बात से बेपरवाह दिखती है कि भारत की निवेश केंद्र की छवि पर इसका विपरीत असर होगा। किसी ऐसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी की बोर्ड बैठक में होने वाली काल्पनिक चर्चा पर विचार कीजिए जो भारत में किसी परियोजना के निवेश के अंतिम चरण में हो। बोर्ड यह विचार कर सकता है कि केयर्न और वोडाफोन पर अतीत से प्रभावी कर के मामले निपटने तक प्रतीक्षा कर ली जाए। सन 2019 में कोविड महामारी के पहले भारत और चीन (हॉन्ग कॉन्ग समेत) में क्रमश: 50.5 और 209.5 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया। स्रोत: यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस आॅन ट्रेड ऐंड डेवलपमेंट। सन 1960 के दशक में जब गालब्रेथ ने हमारे देश को एक क्रियाशील अराजकता वाला देश बताया तब से भारत कई क्षेत्रों में भारी प्रगति कर चुका है। बहरहाल, बड़े भारतीय राजनीति दलों ने अक्सर सार्वजनिक स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा और रोजगार निर्माण से ध्यान भटकाया और उसे धर्म, समुदाय, जाति और भाषाई भेद की ओर ले गए। क्रियाशील अराजकता या निष्क्रिय अराजकता जैसे जुमलों का इस्तेमाल आकर्षक हो सकता है।
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